मेरे बारे में

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सोचा चलो ब्लॉग लिखते हैं. एक तो मुफ्त में है और दूसरा ब्लॉग पढ़ कर समझने वालों कि संख्या बहुत कम है. मुझे जानने वाले तो मेरा ब्लॉग पढ़ेंगे नहीं. आखिर कोई कितना झेले? कोई 'सॉरी गलती से मिस्टेक हो गया टाइप' अगर झांसे में आ भी गया तो थोड़ी सी उम्मीद है कि मेरे शब्दों के जाल उसे उलझा कर रख पाएं. कोई नहीं तो मैं और मेरा खुदा तो है ही. जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है. मेरे बड़े भाई नीरज काफी समय से ब्लॉग लेखन में हैं. मैंने उनका ब्लॉग देखा है, पढ़ा नहीं. क्योंकि शायरी का अलफ बे भी मुझे नहीं आता. तो फिर हमने सोच लिया 'अब चाहे सर फूटे या माथा यारा मैंने तो हाँ कर दी, मैंने ब्लॉग की शुरुआत कर दी, मैंने हँस कर हामी भर दी' लिखने को कुछ समसामयिक विषय होंगे. कुछ छोटी मोटी कहानियों या कविताओं की समीक्षाएं होंगी जो मैं मुख्यत: बच्चों की पाठ्य पुस्तकों से चुनूंगा. ये कुछ आसान सी कहानियाँ और कवितायें अब मुझे थोड़ी बहुत समझ आने लगी हैं. ये रचनाएँ आज के सन्दर्भ में सरलता से अति महत्वपूर्ण सन्देश देती हैं. कुछ बातें दिल को छुएंगी तो कुछ बातें गुस्सा भी दिला सकती हैं. बात अपनी अपनी, ख्याल अपना अपना.

बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

विकास का मॉडल

 विकास का मॉडल

बांके बिहारी लाल और मैं लखनऊ में एक ही स्कूल से साथ साथ रिटायर हुए। फिर दोनों अपने पैतृक गांव बल्लूपुरा में कुछ शांत और सुकून भरा जीवन यापन करने के ख्याल से बोरिया बिस्तर बाँध कर चले आये। सोचा, शायद शहर छूटेगा तो कम से कम सोशल मीडिया से भी छुट्टी मिलेगी और आलतू फालतू की राजनैतिक बहस से भी मुक्ति। लेकिन हुआ एकदम उल्टा। ज्यादा फुरसत, ज्यादा पंचायती और फुल टू राजनीती।

गांव में सुबह जो अखबार वाचन से शुरू होती है तो वो शाम ढलते ढलते चौपाल में गर्मागर्म बहस में बदल जाती है और रात होते होते जबरदस्त राजनैतिक दंगल में। आज भी कुछ ऐसा ही दिन था। बांके जी मुंह में दातुन चबाते हुए अखबार में घुसे हुए थे। मेरे आने की आहट सुन कर तिरछी नज़रों से मुझे निहारा और बोले "आओ भैय्या, आजकल कैसे दूज के चाँद हो रहे हो?"

"अब आपको अख़बार में से मुंह निकालने की फुरसत मिले तब तो देखो कि दुनियाँ में कोई और भी है" मैंने चुटकी ली

"भाई, अखबार  के ऊपर की तारीख बदल दो और फिर वो ही समाचार चिपका दो तो किसी को पता भी नहीं चलेगा" बांके सर खुजाते हुए बोले

"तो फिर काहे को इस जंजाल में उलझे रहते हो?"

"सो तो है, देखो कल भी एक भव्य इमारत के उद्घाटन की खबर आई थी और आज फिर एक विशाल स्टेचू बनने की खबर सुर्ख़ियों में है"

"विकास का नया मॉडल है!"

"क्या ये बड़ी बड़ी इमारते और स्टेचू ही हमारी धरोहर रहेंगी?" बांके के चेहरे पर कुछ चिंता की रेखाएं उकेर आई थीं।"

"शायद कुछ सदियों तक ये इमारतें हमारे इतिहास की साक्षी रहेंगीं लेकिन हमारी सांस्कृतिक धरोहर तो कुछ लेखकों की रचनाएँ ही रहेंगी।"

"रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य अब तक जीवित हैं लेकिन उस काल खंड की कोई भी इमारत देखने को नहीं मिलती।"

 

अचानक मुझे कुछ याद आया और एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर बिखर गई। मैंने बांके के हाथ से अखबार को छीन कर अलग रख दिया और बोला "वो शेक्सपीअर की कविता जो तुम स्कूल में पढ़ाते थे।"

"कौनसी?"

"नॉट मार्बल नार द गिल्डेड मोनुमेंट्स।"

"वाह! क्या याददाश्त है?"

"लेकिन आज दिखावे की राजनीती में कविता को कौन पूछता है?"

"चलो छोडो राजनीती। शेक्सपीयर की सोनेट नंबर ५५ नॉट मार्बल नार गिल्डेड मोनुमेंट्स को सुनाओ।"

Sonnet 55: Not marble nor the gilded monuments

BY WILLIAM SHAKESPEARE

Not marble nor the gilded monuments

Of princes shall outlive this powerful rhyme,

But you shall shine more bright in these contents

Than unswept stone besmeared with sluttish time.

When wasteful war shall statues overturn,

And broils root out the work of masonry,

Nor Mars his sword nor war’s quick fire shall burn

The living record of your memory.

’Gainst death and all-oblivious enmity

Shall you pace forth; your praise shall still find room

Even in the eyes of all posterity

That wear this world out to the ending doom.

So, till the Judgement that yourself arise,

You live in this, and dwell in lovers’ eyes.

  


6 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत पोस्ट...अहा!! तुम्हारे ज्ञान को नमन

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  2. जैसे तैसे कटता सभी का वर्तमान
    व्यापक भविष्य की कहानी होनी चाहिए
    मर के तो एक रोज़ जाना पड़ेगा सबको
    मगर , मरने के बाद भी, निशानी होनी चाहिए !

    ये निशानी किताबें ही हो सकती हैं।

    जवाब देंहटाएं
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    1. एक कवयित्री द्वारा शानदार प्रतिक्रिया

      हटाएं

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