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सोचा चलो ब्लॉग लिखते हैं. एक तो मुफ्त में है और दूसरा ब्लॉग पढ़ कर समझने वालों कि संख्या बहुत कम है. मुझे जानने वाले तो मेरा ब्लॉग पढ़ेंगे नहीं. आखिर कोई कितना झेले? कोई 'सॉरी गलती से मिस्टेक हो गया टाइप' अगर झांसे में आ भी गया तो थोड़ी सी उम्मीद है कि मेरे शब्दों के जाल उसे उलझा कर रख पाएं. कोई नहीं तो मैं और मेरा खुदा तो है ही. जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है. मेरे बड़े भाई नीरज काफी समय से ब्लॉग लेखन में हैं. मैंने उनका ब्लॉग देखा है, पढ़ा नहीं. क्योंकि शायरी का अलफ बे भी मुझे नहीं आता. तो फिर हमने सोच लिया 'अब चाहे सर फूटे या माथा यारा मैंने तो हाँ कर दी, मैंने ब्लॉग की शुरुआत कर दी, मैंने हँस कर हामी भर दी' लिखने को कुछ समसामयिक विषय होंगे. कुछ छोटी मोटी कहानियों या कविताओं की समीक्षाएं होंगी जो मैं मुख्यत: बच्चों की पाठ्य पुस्तकों से चुनूंगा. ये कुछ आसान सी कहानियाँ और कवितायें अब मुझे थोड़ी बहुत समझ आने लगी हैं. ये रचनाएँ आज के सन्दर्भ में सरलता से अति महत्वपूर्ण सन्देश देती हैं. कुछ बातें दिल को छुएंगी तो कुछ बातें गुस्सा भी दिला सकती हैं. बात अपनी अपनी, ख्याल अपना अपना.

मंगलवार, 27 नवंबर 2018

धरती सचमुच घूम रही है

धरती सचमुच घूम रही है 















चेन्नई एक्सप्रेस धीरे धीरे प्लेटफार्म छोड़ने लगी। तभी एक दुबला पतला सांवला सा युवक एक बच्ची को गोद में उठाए डिब्बे की और लपका। पीछे उसकी बीबी और एक छोटा लड़का भी ट्रेन की रफ़्तार को मात देने की कोशिश में थे। तभी एक मज़बूत हाथ ने उनको सहारा दिया। और अगले ही पल समूचा परिवार हवा में झूलता हुआ बोगी के अंदर समा गया।

जनरल डिब्बा था। यहाँ वहाँ सीट पर कुछ लोग बेतरतीब पसरे हुए थे। कुछ भले मानुस अख़बार बिछा कर फर्श पर ही विराजमान थे। डिब्बे के बीचों बीच कुछ मज़दूर कंधे पर गमछा रखे उकड़ू बैठे थे। वैसे डिब्बे में ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं थी फिर भी वो परिवार सहमा हुआ टॉयलेट के पास एक कोने में बैठ गया। बच्ची अपनी माँ की गोद में चिपकी हुई थी। एक पतला सा मैला फ्रॉक उसके कोमल बदन को ढके हुए था। छोटा लड़का इस मामले कुछ ज्यादा ही बदनसीब था। उसकी पुरानी बनियान में सिलसिलेवार कई छेद थे। किसी डेनिम ड्रेस के फैशन डिज़ाइनर के लिए शायद लेटेस्ट आईडिया हो सकता था। वो लड़का एक हाथ से अपनी फटी बनियान को छिपा रहा था तो दूसरे हाथ से अपनी माँ के कंधे को पकड़ कर खड़े होने की कोशिश कर रहा था। युवक के सिर पर एक जालीदार टोपी थी और उसने घुटनों तक एक मटमैली लुंगी चढ़ा रखी थी।

" बांग्ला देसी हो? "
" हाँ.. नहीं.."
" तो? "
" मुग़ल "
" मुग़ल-ए-आज़म, शहंशाहे हिन्द? "

युवक शून्य में ताकता हुआ बोला " मेरे दादा के दादा आख़री मुग़ल बादशाह के देश निकाले के क़ाफ़िले में शामिल थे। बादशाह सलामत बर्मा में जहाँ सुपुर्दे ख़ाक हुए मेरे पुरखे भी वहीँ दफ़्न हुए। बर्मा से वापिस आना मुमकिन नहीं था तो हम सब वहीँ बस गए। "
" रोहंगिया हो? "

युवक सकपका कर इधर उधर देखने लगा। पूरा परिवार घबरा कर एक कोने में दुबक गया। उस बूढ़े के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। बड़ी बड़ी डरावनी मूछें, टेढ़ी भृकुटि, विशाल ललाट और चन्दन का तिलक। गले में जनेऊ और सलीके से पहना हुआ सफ़ेद झक धोती कुर्ता। चेहरे और गर्दन की झुर्रियां जीवन के जटिल अनुभवों की साक्षी थीं।

" मैं रावण " बूढ़े ने मुस्कुरा कर अपना परिचय दिया।
" ओह, तो मैं जी-वन कैसे हो रा-वन " युवक ने शाहरुख ख़ान के अंदाज़ में जवाब दिया।

लेकिन फिर वो युवक सहम गया। धार्मिक चरित्रों से उसे बहुत डर लगता था। पता नहीं कौन किस का इष्ट देव या शत्रु निकल आए।

" मैं राज " बूढ़ा फिर मुस्कुराया।
" तो मैं सिमरन " युवक ने चुटकी ली। " जिस तरह आपने मेरा हाथ थाम कर चलती ट्रेन के डिब्बे में खींचा तो मुझे लगा कि पीछे से कोई भारी भरकम आवाज़ में पुकार रहा था - जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िन्दगी " युवक अब कुछ सहज लग रहा था।

" हाँ तो राज..." युवक की बात अधूरी रह गई।
" मैं रावण " बूढ़े की आँखों की चमक बता रही थी कि वो कोई मज़ाक नहीं कर रहा है. " मैं रा-वन नहीं रावण ही हूँ, वाल्मीकि रामायण वाला " रावण की आवाज़ में स्पष्ट गहराई थी।




















" मैं मीर ग़ालिब। मेरे पुरखे बादशाह सलामत के साथ मुशायरा पढ़ते थे जनाब..." युवक कुछ हकलाते हुए बोला। " लेकिन रामायण वाला रावण तो कब का मर चुका। आप कौनसे रावण हो ?"
" मैं शिव भक्त रावण। मैं तो कभी मरा ही नहीं। तब भी और अब भी। सब मुझे मारने का उपक्रम करते हैं। दर असल मुझे कोई मारना ही नहीं चाहता। विलेन ख़त्म तो फिल्म का द एन्ड। जब विलेन नहीं तो फिर हीरो का क्या काम? दूसरे को बुरा बताएँगे तभी तो खुद अच्छे कहलायेंगे। रावण है इसीलिए श्री राम हैं।  बिना रावण के राम स्थापित नहीं हो सकते। "

अब मीर को विश्वास हो गया था कि इस ज़माने में ऐसी विद्रोही बातें करने वाला प्रकाण्ड पँडित रावण ही हो सकता है। मीर शशोपंज में था।  रावण दोस्त है या दुश्मन ?

तभी रावण ने सवाल किया " शायर हो ?"
मीर चौंका " हाँ, लेकिन कैसे पहचाना ?"
" फटेहाल हो "
" लेकिन फटेहाल तो सारी की सारी जनता है। पर वो सब के सब शायर थोड़े ही हैं "
" जिसके नाम में मीर भी हो और ग़ालिब भी तो वो शायराना नाम वाला भले ही घास छीले पर होगा शायर ही '
" तो कहाँ चले जनाब अपना कुनबा ले कर ?" रावण ने फिर सवाल दागा।
" इक शब् के मुसाफ़िर हैं हम तो, ये दुनिया मुसाफ़िर-खाना  है "
" वाह।  नाम मीर ग़ालिब और शायरी चुराई हुई ? "
" किदार नाथ शर्मा "
" नाम हिन्दू और शायरी उर्दू में ?"
" वो मुझे पता नहीं पर उर्दू हिंदुस्तान और खासकर हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीतों की ज़ुबान है "

रावण ने अब गौर से मीर को देखा। हाथ पकड़ा और उस डिब्बे में बेतरतीब लेटे हुए दो चार को डांट कर उठाया। रावण की रौबीली आवाज़ के सामने किसी ने चूंचां नहीं की। अब मीर का पूरा परिवार एक पूरी सीट पर काबिज़ हो गया था।  जनेऊधारी और गोल जालीदार टोपी वाले को एक साथ देख कर सभी भौंचक्के थे।

रावण ने फिर पूछा " सवारी कहाँ से आई और कहाँ को चली ?
" रखाइन से भागे हैं पर पता नहीं कहाँ जाना है । घर से बेघर हो चुका एक पंछी नशेमन की तलाश में उम्र भर घूमता ही रहेगा। "
फिर थोड़ा सोचते हुए बोला "दो गज़ ज़मीन भी ना मिली कुए यार में। जब बादशाहों का ये हश्र है तो हम ठहरे नाकारा शायरों के खानदान से। हमारी कौन ठौर और क्या बिसात?"
" वो शायर, हाँ, वो जो मुफ्त की पीते थे मय...."
" रावण और शायरी? समझदार भी और नफ़ासतमंद भी। कमाल की चीज़ हैं आप। तो फिर सीता का अपहरण क्यों किया ?" मीर ने तपाक से पूछा।

रावण और सीता का नाम एक ही वाक्य में सुन कर डिब्बे में बैठे सभी लोग चौकन्ने हो गए। फिर लगा रावण कहीं अतीत में खो गया। सभी सहयात्री टकटकी लगा कर रावण को देखने लगे। कुछ देर चुप्पी छाई रही। पास वाले डिब्बे के भी सभी समझदार और नासमझ यात्री अपनी अपनी जगह छोड़ कर इस तीन पांच में शामिल हो गए। कुछ को लगा की कोई रामलीला टाइप मंडली है लेकिन गोल जालीदार टोपी ने रहस्य गहरा दिया था। धर्म, ज्ञान और राजनीती की चर्चा हो तो सामान्य जन कैसे खुद को रोक सकता है?

रावण ने धीरे से गला साफ करते हुए कहा " सूर्पनखा मेरी बहन थी। उसने प्रणय निवेदन किया - बार बार बगिया में कोयल न बोले। लेकिन प्यार के बदले में हमेशा प्यार नहीं मिलता। नासमझ थी। चंचल थी। गुस्सैल थी..."

रावण को इमोशनल होता देख मीर की बीबी सान्तवना देते हुए बोली " एक औरत का दर्द एक औरत ही तो समझ सकती है। प्यार के बदले में दुत्कार मिले तो गुस्सा तो आएगा ना? शायद तब भी समाज में औरत को अपनी बात कहने का हक़ नहीं था। मर्द प्यार मांगे तो ठीक पर औरत कैसे कोई मांग कर सकती है? "
रावण ने खुद को संभाला और अपना पक्ष रखा " और एक भाई ने वोही किया जो उसको ठीक लगा। बहन की रक्षा करने में क्या सही और क्या ग़लत ? "

" तो राम के लिए आपके मन में नफरत जागी और आपने उसकी बीबी को उठा लिया? " माथे पर टीका और कंधे पर भगवा गमछाधारी ने गुस्से में सवाल किया। आस पास बैठे अब रावण को घूर घूर कर देखने लगे। एक बार तो यूँ लगा की मोब लिंचिंग की पूरी तैयारी है।

लेकिन रावण संयत होते हुए बोला " नहीं। उस ज़माने में नफरत पैदा ही नहीं हुई थी। तब सिर्फ क्रोध आता था। बात बात पर क्रोध। चाहे वो राजा हो, चाहे कोई ऋषि मुनि, तपस्वी या आमजन। लक्ष्मण को क्रोध आया उसने मेरी बहन के नाक कान काट लिए। शूर्पणखा को क्रोध आया, मुझे क्रोध आया, हनुमान को क्रोध आया और मेरी लंका ही जला डाली। जब राम को क्रोध आया तो मुझे तीर मारा।" रावण बोलते बोलते कुछ समय रुका। शायद कोई स्टेशन आया था। जब गाड़ी चली तो रावण फिर बोला " लेकिन उसी क्रोधित राम ने लक्ष्मण को मेरे चरणों में आदर सहित ज्ञान प्राप्त करने को बैठाया। नफरत होती तो लक्ष्मण मेरे चरणों में नहीं झुकता। नफरत होती तो मैं प्रेम से लक्ष्मण को मृत्यु शैय्या पर ज्ञान नहीं देता। राम को मुझसे नफरत नहीं पर गुस्सा था। मुझे गुस्सा था। गुस्सा सबकी नाक पर बैठा रहता था। हर छोटी बड़ी बात पर गुस्सा और मार काट या श्राप परन्तु गुस्सा शांत होते ही फिर वापस गलबहियां डाल कर मिलना। इतना गुस्सा उस समय शायद क्लाइमेट चेंज की वजह से था। "

डिब्बे में बैठे सहयात्री गुस्से और नफरत के बीच के अंतर को समझ नहीं पा रहे थे और जब उसमे क्लाइमेट चेंज भी घुस गया तो सभी असहज हो कर एक दूसरे को देखने लगे। तभी अचानक ऊपर की सीट पर बैठे सरदार त्रिलोचन सिंह धम्म से कूदे और बोले " रावण भाई अच्छे वक़्त में मर गए। सीने पर तीर खाया। आपके तो पुतले ही जलाते हैं लेकिन अब ज़माना बदल गया है। आजकल तो लोग गले में जलता हुआ टायर डाल कर ज़िंदा ही जला देते हैं। "

" नफरतों के सैलाब हैं " मीर बीच में ही बोल पड़ा। " तब गाँधी ने गोली खाई लेकिन अब तो शांति दूत आंग सान सू भी ज़माने के साथ बदल गईं हैं।
" लाई हयात आई कज़ा ले चली चले अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले, दुनियाँ ने किस का राह-ए-फ़ना में दिया है साथ तुम भी चले चलो यूँ ही जब तक चले। " मीर गुनगुनाने लगा।

" फिर से चोरी की जौक से और हाँ मुझे मास्टर मदन की याद दिला दी " रावण मुस्कुराया।

कंधे पर गमछा रखे छोटू राम जो बहुत देर से मक्खियां उड़ा रहा था अचानक खीसें निपोरता हुआ रावण के सामने सीधा आकर खड़ा हो गया। बचपन से ही रामलीला देखते समय ये सवाल उसके छोटे दिमाग में घूमा करता था। सर्कस में पेट से जुड़े दो सिर वाले बच्चे देखे थे लेकिन दस सिर वाली कभी हज़म नहीं हुई। जब रावण सोचता होगा तो कौनसा सिर खुजाता होगा? जब कंघी करता होगा तो मांग दाईं तरफ निकालता होगा या बाईं तरफ से? और भी कई ऐसे ही उटपटांग सवाल। छोटू राम थोड़ा झिझका फिर जोर से बोला " आपके सचमुच दस सिर हैं क्या? दिखाइए "

" टेक्नोलॉजी मेरे भाई टेक्नोलॉजी " रावण बोला।
" टेक्नोलॉजी ?"
" हाँ, एक दम आसान टेक्नोलॉजी। थ्री डी होलोग्राम। आज कल इलेक्शन में भी कई नेता इसी होलोग्राम से कई जगह एक साथ प्रकट हो जाते हैं। असली सिर तो एक ही है लेकिन बाकी नौं सिर इसी होलोग्राम से बनते हैं। मेरे सिर पर बड़े बड़े इनाम रखे थी सरकार इसलिए सुरक्षा कारणों से नकली सिर रखने जरुरी हो गए थे। " रावण गब्बर सिंग के अंदाज़ में बोला।

" टिकट? टिकट? ये क्या मज़मा लगा रखा है? टिकट टिकट? " काले कोट में अचानक टी टी महोदय प्रकट हुए।
टिकट न रावण के पास था और न हीं मीर के कुनबे के पास। जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं थी। सो धर लिए गए।

" निकल गई हेकड़ी रावण की आक थू " अब कंधे पर गमछा रखे छोटू राम गब्बर सिंग के रोल में थे।
" चले थे टोपी वाले के साथ "
" ऐसे रावण और उनके रोहंगिया साथियों का सत्यानाश "

अभी तक कुछ समय पहले तक डरे डरे और फिर कूद कूद कर मनोरंजन में हिस्सा लेने वाले यात्री अचानक बेफिक्र हो कर डिब्बे में इधर उधर पसर गए। हताश टी टी उन पांचों को लेकर अगले स्टेशन पर रेल्वे पुलिस को सौंप कर अप्रसन्न  मुद्रा में डिब्बे में वापस लौट आया। डिब्बे में हर तरफ नीरवता पसरी थी।





रविवार, 11 नवंबर 2018

माल - ए – मुफ्त, दिल - ए - बेरहम

माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम









माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम ?

"कन्नौज का बेहतरीन इत्र मुफ्त में ले जाओ मियाँ" लाला मुस्कुराते हुए बोले. 

"और हाँ फ़िरोज़ाबाद की झनझनाती चूड़ियां भी भाभी के लिए एकदम मुफ्त.."


"मुफ्त में?.." कल्लन सकपकाया.

"हाँ भाई हाँ, बिलकुल मुफ्त. इत्र के साथ चूड़ियां भी मुफ्त" लाला ने निष्कपट भाव से जवाब दिया.

"लेकिन मुफ्त?.. कल्लन ने लगभग हकलाते हुए पूछा.

"क्यों? मुफ्त में क्यों नहीं?" लाला अपनी मूछों पर बल देते हुए इतरा कर बोले.

कल्लन ने कनखियों से इधर उधर झाँका. कोई हंस तो नहीं रहा. बाजू की दुकान पर प्रोफेसर लाल खस्ता कचौरी चटकारे मार कर खाने में व्यस्त थे.

लाला बोले "देखो भाई जापान ने मुफ्त में, यूँ ही मुफ्त में, अट्ठासी हजार करोड़ रूपये दे दिए. करोड़ कितना होता है जानते हो ना?"

अब कल्लन के सर खुजाने का समय था. बचपन से ही जापानी खिलौनों का नाम सुनता आया था कल्लन. जापानी गुड़िया तो पूरी दुनियाँ में मशहूर थीं. अफ़सोस इस बात का था की कभी देखने को भी नसीब नहीं हुई. शायद बहुत महंगी रही होगी. जब सारा दिन गिल्ली डंडे, सितोलिये, छुपन-छुपाई और गिट्टे खेलने में बीत जाए तो जापानी गुड़िया की कमी भला किसको खलेगी? जापानी गुड़िया की कमी महसूस ना होने का एक दूसरा कारण भी था. राशन की लम्बी लाइन. पीएल ४८० का एक पंसेरी लाल गेहूं, दो लीटर घासलेट का तेल और नसीब अच्छा हो तो आधा सेर काली पीली बारीक़ चीनी. जब राशन वाला दुकान ना खोले या बाहर 'स्टॉक नहीं है' का बोर्ड लगा दे और फिर अगले दिन दोबारा उसी लाइन में खड़ा होने पड़े तो किसी 'कंचे जैसी फिरोज़ी आँखों वाली जापानी गुड़िया' का सपने में भी ख्याल आना नामुमकिन था. 









"बुलेट ट्रेन यानि गोली जैसी तेज़ चलने वाली ट्रेन" लाला ने जानबूझ कर रेलगाड़ी नहीं बोला था. रेलगाड़ी बोलने से लगता कि किसी बैलगाड़ी जैसी चीज़ की बात कर रहे हों.

"जापान ने इतनी महंगी बुलेट ट्रेन ही क्यों दी? पहले तो कभी एक गुड़िया भी मुफ्त में नहीं दी थी" कल्लन की छोटी सोच ने उसको बोलने पर मजबूर कर दिया.

"हाँ सो तो है, लेकिन..." लाला सोच में पड़ गया.

"गरीब भूख के मारे हाथ फैलाये तो भिखारी कहलाता है. एक पैसा दो पैसे मांगे तो दुत्कार दिया जाता है. फिर भला हमको ऐसे ही मुफ्त में बुलेट ट्रेन लेने में संकोच नहीं हुआ? कल्लन ने अपनी विद्वता झाड़ी.

लाला को कुछ सूझा नहीं पर बोले "देखो भाई, हमने माँगा नहीं, उन्होंने खुद ही दे दिया"

"लेकिन जिसने आज तक एक खोटी चवन्नी भी नहीं दी वो अचानक अट्ठासी हज़ार करोड़ कैसे देगा?" कल्लन ने शक जाहिर किया.

"इतने तीर्थ स्थान हैं, मंदिर हैं, बड़े बड़े पैसे वाले सोना चाँदी और करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाते हैं. लाला ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया.

"लेकिन हमको कोई दान चढ़ावा क्यों देगा? कल्लन सोच में पड़ गया.

"अरे भाई कल्लन मियाँ, भारत विश्व गुरु है ना इसलिए" अचानक ये जवाब देकर लाला की बांछें खिल गईं.

"मेरी दादी कहती थी कि देने वाले का हाथ हमेशा ऊपर होता है इसलिए वो बड़ा होता है. और गुरु दक्षिणा तो ज्ञान देने के बाद ही मिलती है ना? कल्लन ने फिर सवाल दागा.

प्रोफेसर लाल ने कचौरी खाकर चटनी वाले हाथ पोंछते हुए बीच बचाव किया. "भारत विश्व गुरु था और रहेगा. जापान ने अट्ठासी हज़ार का सॉफ्ट लोन दिया है जो धीरे धीरे तीन लाख करोड़ बन जायेगा, मुफ्त में वाला तो एक वाटसएप यूनिवर्सिटी वाला जुमला है भाई"

प्रोफेसर लाल गांव के प्राइमरी स्कूल में सारे विषय पढ़ाते थे. अजीब सा गोल फ्रेम वाला चश्मा लगाते थे इसलिए सब उनको प्रोफेसर बुलाते थे. स्कूल के मास्टर थे सो उनको हर विषय का गूढ़ ज्ञान होना लाज़मी था. केबीसी में 'घर बैठे जैकपोट' जीतने के हर सवाल का सही जवाब भी देते थे. वो अलग बात है कि कभी नेटवर्क तो कभी बिजली फेल हो जाने के चलते ईनाम पाने से महरूम रह जाते थे. बैटर लक नेक्स्ट टाइम.

कल्लन को अपनी अज्ञानता पर बहुत शर्म आयी और उसने अपना सर झुका लिया. प्रोफेसर लाल को श्रोता मिले तो चहकते हुए अपना ज्ञान बघारने लगे "भारत का सबसे बड़ा योगदान है - शून्य"

"शून्य" कल्लन और लाला दोनों के मुंह खुले के खुले रह गए.  

"हाँ शून्य" प्रोफेसर साहेब ने कचौरी खा कर तृप्ति से डकार लेते हुए जवाब दिया. दोनों को लाजवाब देख कर प्रोफेसर साहब दोनों हाथ हिला कर अमिताभ बच्चन के अंदाज़ में बोले "भला बताओ तो अट्ठासी हज़ार करोड़ में कितने शून्य होते हैं?"

"इतना ही पढ़े लिखे होते तो यूँ घास थोड़े ही छील रहे होते? लाला खिसिया कर बोले. 

अब प्रोफेसर ने दार्शनिक जैसे अंदाज़ में अपनी हिटलर जैसी मूछों पर हाथ फेरते हुए जवाब दिया "अट्ठासी हज़ार करोड़ में उतने ही शून्य होते हैं जितने शून्य टूजी घोटाले में होते हैं. खैर ये सब बातें तुम लोगों को समझ नहीं आएंगी"

यह सुन कर लाला आहत होते हुए बोले "सो तो है. हर घोटाले में बहुत सारे शून्य होते हैं"

"और जज साहब सुबूत का इंतज़ार करते रहते हैं" कल्लन ने चुटकी लेते हुए 'जॉली एलएलबी' के डायलॉग की नक़ल करते हुए माहौल को हल्का करने कि कोशिश की. 

लेकिन प्रोफेसर लाल की गंभीर मुद्रा पर कोई असर नहीं हुआ और वो बोलते गए "जिस धरती पर अतीत काल से शून्य से लेकर पुष्पक विमान तक बनते हों उसे अब जापान से एक रेल गाड़ी खरीदनी पड़ती है. अट्ठासी हज़ार करोड़ में लाखों गॉवों में कितने ही प्राइमरी स्कूल और कॉलेज बन जाते"

प्रोफेसर लाल का बोलते बोलते गला रुंध गया. लाला ने इत्र और चूड़ियां एक पोटली में बांध दी और बोले "दोस्ती हमेशा मुफ्त में ही होती है कल्लन मियाँ. प्यार के कोई दाम नहीं होते"

दिन ढलने को था. शाम का धुंधलका छाने लगा. शायद धूल भरी आँधी आएगी. गांव की सर्पीली कच्ची पगडण्डी पर रामलाल की बैलगाड़ी हिचकोले खाती आ रही थी. कल्लन लपक कर उसमें सवार हो गया. अपनी पोटली में रखी इत्र और चूड़ियां प्यार से सहेज लीं. कोई तो है जो कहता है वो करता है. लाला की प्यार भरी सौगात पा कर उसकी ऑंखें भर आईं थीं. 



आपदा में अवसर

  आपदा में अवसर 'रेवड़ी ले लो, रेवड़ी ले लो' बाहर से जोर जोर से आवाज़ें आ रही थीं। जनप्रिय नेता पीएल ने अपनी पार्टी की टोपी सीधी की औ...