आज अचानक छेदीलाल जी अल सुबह बगीचे में टहलते हुए मिल गए। बचपन के मित्र या यूँ कहें कि लंगोटिया यार हैं तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। समय बीता, हम फटीचर ही रह गए जबकि छेदीजी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करते गए। क्या धंधा करते हैं ये मुझे कभी समझ नहीं आया क्योंकि लक्ष्मी मैय्या से अपना हमेशा से छत्तीस का आंकड़ा रहा है। तो छेदीजी राजा भोज बन गए और हम गंगू तेली ही रह गए। जमाने के रस्मों रिवाज़ के अनुसार भोज और गंगू का मिलना भी कम होता गया।
देवानंद को आदर्श मानने वाले हमारे जमाने के फैशनेबल युवा धुएं के छल्ले निकालते थे। बदले हुए वक़्त में अब धुएं के छल्ले जॉगिंग में बदल गए हैं। सुबह हो या शाम, बूढ़े बच्चे या जवान, आदमी या औरत, कुत्ते, बन्दर या बिल्ली यानि सभी सुबह शाम जॉगिंग करते हुए मिल जाते हैं। मेरा और छेदीजी का प्रातः भृमण भी उसी बदले हुए वक़्त की अभिव्यक्ति थी। लेकिन संयोग वश हमारा मिलना बहुत कम हो पाता था।
छेदीजी के चेहरे पर जमा चर्बी उनके बैंक बेलेंस का प्रचार कर रही थी। जबकि गालों पर छाई चमक उनके नियमित फेशियल करवाने का प्रमाण दे रही थी। सलीके से काले रंगे बाल किसी मधुमक्खी के छत्ते का धोखा पैदा कर रहे थे।
बेंच पर बैठ कर जोर जोर से सांस ऊपर नीचे खींचने के बाद छेदीजी मुझे देख कर मुस्कुराये। निर्विकार भाव से शून्य में ताकते हुए बोले 'पांच हज़ार की रसीद काटूं या दस हज़ार की?'
मैं चौंका। लेकिन मुझे
ख़ुशी भी हुई कि छेदीजी मेरी हैसियत शून्य से कुछ ऊपर की तो मानते ही हैं। मैंने प्रश्न
चिन्ह की मुद्रा में उनको घूरा। मेरे चेहरे पर अचानक बदले हुए भाव देख कर छेदीजी मुस्कुराये
और बोले 'मैंने एक राजनैतिक पार्टी बनाई है उसके लिए चंदा
चाहिए।'
असली दोस्त वो ही होता
है जो चाहे कड़वी हो लेकिन सही सलाह देता है। मैं अपनी बात आगे बढ़ते हुए बोला 'भाई बुरा
न मानें तो आपकी ये राजनैतिक पार्टी निश्चित रूप से फेल हो जाएगी। भला जनता से भी कोई
चंदा लेता है? चंदे के लिए तो अमीरों की तिजोरियां हैं ना? वो क्या कहते हैं उसको इलेक्टोरल
बांड। सुना है बड़े बड़े सेठिया ख़ुशी ख़ुशी देशभक्ति के नाम पर ये बांड खरीद कर चंदे के
रूप में दान कर देते हैं।’
मैंने आगे समझाते हुए
बतलाया ‘जनता से चंदा नहीं लिया जाता बल्कि उनको तो लाइन में खड़ा कर के वो रंगीन फोटो
वाला अनाज वाला झोला मुफ्त में बांटा जाता है। अब आप जनता को मुफ्त झोला न देकर चंदा
मांगोगे तो सोचो क्या होगा?' मैं अपना राजनीती का ज्ञान बघार कर अति प्रसन्नता से छेदीजी
को निहारने लगा। मन ही मन सोचा कि लो भाई आप तो चंदा मांगने निकले थे अब लेने के देने
पड़ गए।
घाघ शब्द किसी भी राजनेता
का पर्याय वाची है इस बात का एहसास मुझे तब हुआ जब छेदीजी ने मुझे हिकारत की नज़र से
देखा और मंद मंद मुस्कुराने लगे। मुझे शशोपंज में पड़ा देख कर वो बोले 'ये विषय बहुत
जटिल है। मैंने प्रसिद्ध मैनेजमेंट एक्सपर्ट और इकोनॉमिस्ट शांति नारायण को अपना राजनैतिक
सलाहकार नियुक्त किया है। ऑक्सफ़ोर्ड, हॉवर्ड और पता नहीं कहाँ कहाँ से डिग्री लेकर
ये सज्जन राजनीती विज्ञान में महारत हासिल कर चुके हैं।'
'लेकिन राजनीती में हॉवर्ड
की जगह हार्ड-वर्क या जुगाड़-वर्क ज्यादा काम आता है' मैंने इशारों ही इशारों में समझाने
की कोशिश की।
छेदीजी ने जेब से पॉलीथिन में लिपटा हुआ खैनी का पैकेट
निकाला। और फिर मजे से अपनी हथेली पर चुटकी भर खैनी लेकर चूना मलने लगे। संवाद में
आई ख़ामोशी को छेदीजी ने जोर जोर से ताली पीट कर डस्ट उड़ाते हुए दूर किया।
इत्मीनान से खैनी को
ओठों के बीच दबा कर छेदीजी फिर धीरे से बुदबुदाए 'समय बदल गया है। अब सब जगह कॉर्पोरेट
कल्चर आ गया है। तकनीक और विज्ञान का जमाना है। साम्यवाद विफल हो चुका है उसकी जगह
फिर से तानाशाही राज आ चुका है। समस्त विश्व में पूंजीवाद का बोलबोला है। इसलिए ये
नया राजनीती का मॉडल अब सिर्फ और सिर्फ पैसे के बल पर ही चलता है।'
'सो तो है लेकिन सिस्टम
तो पैसे देकर वोट खरीदने का है और आप तो जनता से ही पैसे मांगने चले हो?' मैंने फिर
अपनी विद्व्ता झाड़ी लेकिन छेदी बेअसर दिखे।
'देखो भाई अब कान को
घुमा कर पकड़ने का वक़्त चला गया है। हर चीज़ खरीदी या बेची जा सकती है। वो मुफ्त का राशन
भी आपके ही पैसों से खरीद कर आपको एहसान दिखा कर वापस टिकाया जाता है। आखिर जनता ही
तो तरह तरह के टैक्स देती है। जनता का ही पैसा है, कोई पैसे पेड़ों पर थोड़े ही लगते
हैं?'
मेरे चेहरे पर उकताहट
और कन्फूज़न की गहरी रेखाएं देख कर छेदीजी थोड़ा रुके और समझाते हुए बोले 'जनता सब जानती
है। पैसा कहाँ से आता है, कहाँ जाता है। कौन कितना ईमानदार है और कौन कितना भृष्ट,
ये सब अब वोटर के लिए मायने नहीं रखता। चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर, कटना
तो खरबूजे को ही है। इसीलिए अब हम राजनीती में एक नया मॉडल लेकर आ रहे हैं जिसका नाम
है - खाओ पियो मौज़ मनाओ पार्टी'
'खाओ पियो मौज़ मनाओ पार्टी?
भला ये कैसा नाम है? इसके तो नाम से ही घपले की बू आ रही
है?'
'जी हाँ, इसको हम ईमानदारी
से की गयी बेईमानी कह सकते हैं।'
'वो कैसे?'
'देखो भाई, रिश्वत तो
देनी ही पड़ती है फिर क्यों न हम रिश्वत का एक रेट कार्ड बना कर इसे एक सर्विस का नाम
दे दें? हर काम का एक रेट फिक्स रहेगा और समय समय पर मार्किट फोर्सेज के अनुसार बदलता
रहेगा। अब लुकाने छिपाने का क्या लाभ? राशन कार्ड हो या ड्राइविंग लाइसेंस सब काम घर
बैठे करवाएं और बदले में हमको फीस चुकाएँ। सरकारी कॉन्ट्रेक्ट हो या स्कूल में एडमिशन,
अगर आप मेंबर हैं तो आपको डिस्काउंट मिलेगा। मेम्बरशिप के कई रेट कार्ड हैं। पांच हज़ार
वाली सामान्य या पांच करोड़ वाली लक्ज़री।'
'पांच करोड़?'
'इससे भी ज्यादा। जितना
बड़ा इन्वेस्टमेंट उतना बड़ा लाभ। जैसे की कोई ठेका लेना हो या पार्लियामेंट की सीट इत्यादि।
कुछ जगह तो प्रतिस्पर्धात्मक बोली लगाने का भी प्रावधान रखा गया है।
विशुद्ध कारोबार है।'
'वाह वाह इसे कहते हैं
खुल्ला खेल फरूखाबादी।'
'जी हाँ, धंधे का मामला
है। धंधे के नियम हैं और कोई लाग लपेट नहीं, कोई भाई भतीजावाद नहीं। जितना गुड़ डालो
उतना ही मीठा होगा यानि जितना बड़ा इन्वेस्टमेंट उतना ही बड़ा लाभ लेने के अवसर। सबके
लिए समानता, चाहे कोई भी जाति या धर्म हो, सबके लिए जुड़ाव यानि अनेकता में एकता - एक
राष्ट्र एक ही भाषा - पैसे की भाषा।'
मैंने आव देखा न ताव
मोबाईल में अपने अकाउंट का बैलेंस चेक किया और तुरत फुरत में पांच हज़ार रूपये ट्रांसफर
कर दिए क्योंकि अर्ली बर्ड डिस्काउंट जो लेना था।