स्वर्गीय यतीश गौड़ के उदगार - लगातार वाद विवाद और झगड़े के बाद यतीश ने जब मेरे कार्य की मीमांसा की तो पता चला कि मैं कितना महान हूँ (गलत फहमी पालने में क्या हर्ज़ है?)
अफ़सोस, कोविड की दूसरी लहर ने हमारे इंजीनियरिंग कॉलेज के इस साथी और वाद विवाद के मेरे इस विचारक प्रतिद्वंदी को हमसे छीन लिया। यतीश के लिए ग़ज़ल के बोल हैं - रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ...
दीपक गोस्वामी पर कुछ विचार:
दीपक गोस्वामी से वार्ता हुई। उसने स्पष्ट कहा कि पढाई, नौकरी, परिवार आदि के बारे में बताने में उसे कोई खास आकर्षण नहीं है। उतना बताया जाए जो ग्रुप में उभरकर प्रकट है। उत्तम विचार हैं, लीक से हटकर हैं पर स्वागतयोग्य भी हैं। ऐसा ही कर रहा हूं।
दीपक गोस्वामी मेरी दृष्टि में एक उत्कृष्ट व्यक्तित्व है। विचार करें कि हम अपने व्यक्तिगत विकास से दूसरों को क्या दे पाते हैं? ललित यदि श्रेष्ठ है तो मुझे उससे क्या लाभ मिला, समाज का क्या भला हुआ? उसने ग्रुप में अपने विचार कभी नहीं रखे, अपनी श्रेष्ठता शेयर नहीं की। कोई भी कारण हो सकता है। विचारों की अस्पष्टता भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। जबकि दीपक अपने ज्ञान को बिंदास शेयर करता है। आत्मविश्वास से भरपूर स्पष्टता से अपनी बात रखता है। आंकड़े देकर हमारी गलत मान्यताओं पर प्रहार करता है। उसके लिखे और बारबार लिखे को पढकर हम सोचने को बाध्य होते हैं कि कहीं हम गलत दिशा में तो नहीं हैं। हममें एक सोच उत्पन्न करने का, एक जागरूकता लाने का महत्वपूर्ण कार्य दीपक करता है। ऐसा वो क्यों करता है, क्यों नहीं वो भी दूसरों की तरह ग्रुप को केजुअल लेकर छोटीमोटी हंसीमजाक करके अपना रोल समाप्त मान ले। पर उसके व्यक्तित्व में, उसकी आंतरिकता में ऐसा कुछ है जो लोगों को बांटा जा सकता है। उसकी जीजिविषा साथियों को एक दिशा देने में है। ईश्वर लाखों में से किसी एक को ही ऐसी विलक्षणता से नवाजता है। उसकी इस सेवा के लिए हमें उसका कृतज्ञ होना ही चाहिए, उसके व्यक्तित्व की ग्रुप में मुक्त कंठ से सराहना होनी ही चाहिए। पर वो हमें गलत दिशा तो नहीं बता रहा? आइए हिंदू धर्म एवं राजनीति विषयों पर उसके विचारों को समझें:
एक उत्कृष्ट व्यक्ति संसार की भत्सर्ना करके उसे बाध्य कर देता है कि वह (संसार) भी उसकी व्याख्या करे। दीपक ने भी अपनी लेखनी से सभी को बाध्य करता है कि उसके विचारों का विश्लेषण और विवेचन किया जाए और मैं भी ऐसा करने का प्रयास कर रहा हूं। मेरी समझ में किसीके प्रबुद्ध होने का केवल यही लक्षण नहीं है कि वह किसी चर्चा का विषय हो, किंतु यह भी लक्षण है कि वह लोगों की भ्रांत धारणा का विषय भी बने और दीपक भी इन दोनों लक्षणों से बच नहीं पाता है।
अपने युग को समझने का प्रयत्न करना टेढी खीर है। इसी तरह किसी व्यक्ति को समझना और भी कठिन होता है। हम प्रायः ऊपरी तौर से उसके क्रियाकलाप एवं कहे-लिखे शब्दों के बहाव में बह जाते हैं। पर गहराई में जाने पर हमें एक भिन्न व्यक्ति ही दिखाई पडने लगता है। वैसे व्यक्ति स्वयं भी अपने को निर्लिप्त भाव से नहीं जान पाता कि उसके अवचेतन में क्या चल रहा है।
ठीक इसी तरह दीपक के लिखे को गहरे विचारें तो मानवता के भले के लिए उसकी जद्दोजहद स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। उसके अंदर कुछ है जो बाहर आने को आतुर है। प्रकटन की इस प्रक्रिया में वो बहुत साहसिक होने से भी नहीं हिचकिचाता। कठोरता से प्रहार करता है जिससे हमारी भ्रांत मानयताओं पर प्रश्नचिन्ह लगे और हम सोचने को बाध्य हों। जिन दो मुख्य विषयों पर दीपक बल देता है, आइए उन पर विचार करें:
हिंदू धर्म:
मेरी समझ से दीपक के मत में भारत में हिंदू शब्द किसी मत या व्यक्ति में से नहीं उपजा बल्कि सिंधु नदी के नाम से ये बन आया। उसपार के लोगों ने इसपार वालों को हिंदू कहा और वो चल निकला। अतः हिंदू किसी विचारधारा या मत-तत्ववाद से जडा-सजा नहीं है बल्कि इसपार रहनेवाली सब विचारधाराओं की समष्टि है। इसमें यदि कोई आग्रह है तो नागरिकों की मूल्यरक्षा का। इसमें ईश्वर के अस्तित्व को मानने की बाध्यता कभी नहीं रही। यह सुस्थापित है कि वेद वे संग्रह हैं जिनमें असाधारण, साधारण एवं अवसाधारण सभी हैं। उत्कृष्ट है तो निकृष्ट भी है। आज कौन है जो ऐसा भेद कर पाए और असाधारण को अलग से चिन्हित कर पाए।
वैदिक काल में मानव प्रकृति के वैविध्य को कोई अवरोध नहीं मिला। चार्वाक भी हुए और बिना अवरोध के ऋषि कहलाए। उन्होंने वर्तमान को महत्व दिया और कालातीत सत्ता पर प्रश्न उठाए। ऐसे अनेक व्यतिरेक मूल भारतीय आस्था को उदात्त करते गए।
कालांतर में अनेक समूह सिंधु के इसपार आते रहे और इस भूमि को रोंदते, कुचलते बढते गए। कितनी ही जातियां और धाराएं आईं पर सब अपना अलगपन खो रहीं। यहां के वासियों में घुलमिलकर सहज हिंदू ही हो गई। केवल अंग्रेज ही ऐसे आए जिनका हित यहां फूट डालने से सुविधाजनक बना। अंग्रेजों के आने से भारत में राष्ट्रवाद पनपा और आर्थिक उन्नति की अवधारणा ने बल पकडा। साथ ही, "फूट डालो और राज करो" जैसी चारित्रिक और नैतिक अवनति का युग प्रारंभ हुआ।
दीपक धर्म के मानवीय पक्ष पर से दृष्टि नहीं हटा पाता। धर्म कोई बौद्धिक विलास की सामग्री नहीं होनी चाहिए। उसे हर अस्पृश्य गरीब के जीवन को बेहतर बनाने के लिए मानवीय होना होगा। धर्म शब्द की आवश्यकता ही क्या है? इसे मानवता अथवा मानवीय मूल्यों के रूप में क्यों न जाना जाए। मेरी समझ में धर्म के इस उदात्त रूप को सर्वस्वीकृति मिलनी ही चाहिए। शायद, ऐसे में इससे सभी धर्म सहज ही जुड पाएंगे। शांन्तिनिकेतन के मुख्य द्वार पर अंकित है: "इस स्थान में न केवल किसी प्रतिमा की पूजा की जाएगी, वरन् किसी भी धर्म से घृणा नहीं की जाएगी।" पारस्परिक संघर्ष और प्रतियोगिता मिटाने के लिए आवश्यक है कि वैचारिक सहिष्णुता की भावना का विकास हो। इससे धर्मों का पूर्वाग्रह मिटेगा और आपस की गलतफहमी दूर होगी। हिंदू धर्म में ऐसी सहिष्णुता सदैव रही है। दीपक ऐसी सोच को केंद्र में रखकर धर्म विषय पर कमेंट करता है जो भारतीय परंपरा के नितांत अनुरूप है। राजनीति में अपने लाभ के चलते कुछ शक्तियां ऐसी भावनाओं का विरोध करती हैं और वैमनस्य को बढावा देती हैं तो ऐसी शक्तियों के विरोध में मुखर होने वाले का स्वागत ही होना चाहिए। अतः धर्म विषय पर दीपक के प्रहार सटीक एवं स्वागतयोग्य हैं और भारतीयता में रचे-बसे हैं।
राजनीति:
राजनीतिक प्रवर्ग उच्चतम नहीं है। राज्य का अस्तित्व इसलिए है ताकि उसके नागरिक अच्छा जीवन व्यतीत कर सकें। यह एक सामाजिक सुविधा है। सरकार अपने आचरण की स्वयं ही न्यायकर्ता नहीं बन सकती। राज्य नैतिक नियमों से ऊपर नहीं होता। आजकल राज्य की पूजा का प्रचलन चल पडा है, उसे ईश्वर की तरह सर्वशक्तिमान माना जाने लगा है। लोग समझते हैं कि क्या गलत क्या सही का निर्धारण सरकार के हाथ है। पर सत्य ये है कि जिस सीमा तक राज्य नागरिकों के हित की चेष्टा करता है और उसकी रक्षा करता है, उसी सीमा तक राज्य का औचित्य सिद्ध होता है।
अब यदि कोई सरकार नागरिकों के हित में काम नहीं कर रही हो तो उसके विरोध में लिखना गलत कैसे हो सकता है। मोदी सरकार यदि नौकरियां उपलब्ध नहीं करा पाई तो उसका विरोध पूर्णतः उचित माना ही जाना चाहिए। यदि कोई सरकार धार्मिक वैमनस्यता के आधार पर सत्ता प्राप्ति का प्रयास करती नजर आती है तो हर जागरूक नागरिक को ऐसे कृत्यों का विरोध करना ही चाहिए। ये लोकतंत्र के हित में ही होगा। सरकार को हर पल चेताया जाना चाहिए कि नागरिकों के हित नहीं साधने पर उसे सत्ता-च्युत होना ही होगा, चाहे कोई सरकार हो।
मैंने पाया है कि दीपक मोदी का विरोध आंकड़े देकर करता है। यदि गौर से देखो तो वो कोंग्रेस सपोर्टर नहीं लगता। नेहरू आदि के डेटा के आधार पर जब ध्यान भटकाने का प्रयास होता है तो वो उसके सपोर्टिंग डेटा प्रस्तुत कर देता है जिससे मूल गलतियों से ध्यान भटकाने का प्रयास विफल किया हो सके। उद्देश्य स्पष्ट है कि यदि सत्तापक्ष गलती करे तो उसके खामियाजे से वो बच न पाए। ये सर्वथा देशहित में है। यदि हमें ऐसे डेटा मिलते हैं तो उनपर विचार करने में क्या दोष है। फिर भी दीपक किसी विशेष पार्टी को वोट देने की बात कभी नहीं कहता। पर सरकार के कामों पर बारीक दृष्टि बनाए रखने की उसकी सलाह देशहित में ही मानी जानी चाहिए। राजनीति की उसकी पोस्टें हमें रेडिमेड सूचना उपलब्ध करातीं हैं और साथ ही ये सलाह भी देती है कि ये विचार करने का क्षेत्र है न कि किसी पूर्वाग्रह के आधार पर कोई मत स्थापित करने का।
धार्मिक पक्षों के आधार पर वोट प्राप्त करने के किसी भी प्रयास का दीपक पुरजोर विरोध करता है और ये देशहित में ही है और निर्विवाद भी। हम राजनीति विषय को केजुअल लेते हैं जबकि ये हमारे जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करती है। दीपक की दृष्टि में राजनीति में बहुत विचार करके सत्य निर्धारित करने की आवश्यकता है। अच्छे व्यक्तियों की जीत देश का भाग्योदय कर सकती है। दीपक की ऐसी मानसिकता स्वागतयोग्य होनी ही चाहिए। उसकी पोस्टौं को इन्हीं आधारों पर जांचा-परखा जाना चाहिए। फिर भी, उसके द्वारा हुई किसी गलती को स्वीकारने में उसने कभी देरी नहीं की। ये उत्कृष्टता ही है।
सारांश:
आज क्रियाशील मनुष्य चिंतनशील मनुष्य से काफी आगे बढ गया है और इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि हम जीवन को गहराई से जांचे-परखें। आज बेइमानी एक सामान्य परंपरा और शिष्टाचार बन गई है। धार्मिक लोग भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। हम अपने को कहते तो धार्मिक हैं पर भिन्न मानदंडों पर दुहरा जीवन जीते हैं। धार्मिक लोगों में आगे बढकर काम करने की प्रवृत्ति का भी अभाव नजर आता है। आज धर्म के पुनर्गठन की आवश्यकता है जिससे वो वैज्ञानिकता के आधार पर देश के पुनर्निर्माण में सहायक सिद्ध हो सके।
मनुष्य आज मनुष्य का दर्शक बन गया है। क्षितिज पर एक नये मानववाद का उदय हो रहा है। लोगों के बीच आपस में घनिष्ठ जानकारी बढ रही है और इससे विश्व-चेतना का कोंन्सेप्ट स्पष्टता पा रहा है। अब हम अपने धर्म की डेढ चावल की खिचड़ी अलग नहीं पका सकते। हमें विश्व-चेतना में अपना योगदान देने को तत्पर होना ही होगा।
दीपक मानववाद का पक्षधर है और धार्मिक संकुचितता का प्रबल विरोधी। सरकारों की मनमानी करने की प्रवृत्ति उसे कतई नहीं सुहाती। उसका अन्तर्मन इसके विरोध में उठ खडा होता है। ये हमारे ग्रुप का सौभाग्य है कि दीपक जैसा विलक्षण सदस्य हमसे जुडा है और सत्य जानने में हमें एक्टिवली प्रोत्साहित करता है। ईश्वर उसे इसी तरह सबका मददगार बनाए रखे, ऐसी प्रार्थना करता हूं।
