विकास का मॉडल
बांके बिहारी लाल और मैं लखनऊ में एक ही स्कूल से साथ साथ रिटायर हुए। फिर दोनों अपने पैतृक गांव बल्लूपुरा में कुछ शांत और सुकून भरा जीवन यापन करने के ख्याल से बोरिया बिस्तर बाँध कर चले आये। सोचा, शायद शहर छूटेगा तो कम से कम सोशल मीडिया से भी छुट्टी मिलेगी और आलतू फालतू की राजनैतिक बहस से भी मुक्ति। लेकिन हुआ एकदम उल्टा। ज्यादा फुरसत, ज्यादा पंचायती और फुल टू राजनीती।
गांव
में सुबह जो अखबार वाचन से शुरू होती है तो वो शाम ढलते ढलते चौपाल में गर्मागर्म बहस
में बदल जाती है और रात होते होते जबरदस्त राजनैतिक दंगल में। आज भी कुछ ऐसा ही दिन
था। बांके जी मुंह में दातुन चबाते हुए अखबार में घुसे हुए थे। मेरे आने की आहट सुन
कर तिरछी नज़रों से मुझे निहारा और बोले "आओ भैय्या, आजकल कैसे दूज के चाँद हो
रहे हो?"
"अब
आपको अख़बार में से मुंह निकालने की फुरसत मिले तब तो देखो कि दुनियाँ में कोई और भी
है" मैंने चुटकी ली
"भाई,
अखबार के ऊपर की तारीख बदल दो और फिर वो ही
समाचार चिपका दो तो किसी को पता भी नहीं चलेगा" बांके सर खुजाते हुए बोले
"तो
फिर काहे को इस जंजाल में उलझे रहते हो?"
"सो
तो है, देखो कल भी एक भव्य इमारत के उद्घाटन की खबर आई थी और आज फिर एक विशाल स्टेचू
बनने की खबर सुर्ख़ियों में है"
"विकास
का नया मॉडल है!"
"क्या
ये बड़ी बड़ी इमारते और स्टेचू ही हमारी धरोहर रहेंगी?" बांके के चेहरे पर कुछ चिंता
की रेखाएं उकेर आई थीं।"
"शायद
कुछ सदियों तक ये इमारतें हमारे इतिहास की साक्षी रहेंगीं लेकिन हमारी सांस्कृतिक धरोहर
तो कुछ लेखकों की रचनाएँ ही रहेंगी।"
"रामायण
और महाभारत जैसे महाकाव्य अब तक जीवित हैं लेकिन उस काल खंड की कोई भी इमारत देखने
को नहीं मिलती।"
अचानक
मुझे कुछ याद आया और एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर बिखर गई। मैंने बांके के हाथ से
अखबार को छीन कर अलग रख दिया और बोला "वो शेक्सपीअर की कविता जो तुम स्कूल में
पढ़ाते थे।"
"कौनसी?"
"नॉट
मार्बल नार द गिल्डेड मोनुमेंट्स।"
"वाह!
क्या याददाश्त है?"
"लेकिन
आज दिखावे की राजनीती में कविता को कौन पूछता है?"
"चलो
छोडो राजनीती। शेक्सपीयर की सोनेट नंबर ५५ नॉट मार्बल नार गिल्डेड मोनुमेंट्स को सुनाओ।"
Sonnet 55: Not marble nor the gilded monuments
Not
marble nor the gilded monuments
Of
princes shall outlive this powerful rhyme,
But
you shall shine more bright in these contents
Than
unswept stone besmeared with sluttish time.
When
wasteful war shall statues overturn,
And
broils root out the work of masonry,
Nor
Mars his sword nor war’s quick fire shall burn
The
living record of your memory.
’Gainst
death and all-oblivious enmity
Shall
you pace forth; your praise shall still find room
Even
in the eyes of all posterity
That
wear this world out to the ending doom.
So,
till the Judgement that yourself arise,
You
live in this, and dwell in lovers’ eyes.
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अद्भुत पोस्ट...अहा!! तुम्हारे ज्ञान को नमन
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंबहुत खूब
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंजैसे तैसे कटता सभी का वर्तमान
जवाब देंहटाएंव्यापक भविष्य की कहानी होनी चाहिए
मर के तो एक रोज़ जाना पड़ेगा सबको
मगर , मरने के बाद भी, निशानी होनी चाहिए !
ये निशानी किताबें ही हो सकती हैं।
एक कवयित्री द्वारा शानदार प्रतिक्रिया
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