दीमक
सुना था हर
कुत्ते के दिन
बदलते हैं। लेकिन
इस बार हुआ
यूँ कि एक
बंदर के ही
दिन बदल गए।
किस्मत का खेल!
जो अब तक
उछल कूद कर
झाड़ियों पर बेर
ढूंढता था, अचानक
चम्पक वन का
राजा बन गया।
लोकतंत्र की परम्परा
है, राजा से
सबको डरना जरुरी
होता है। उस
बन्दर के हाथ
में एक उस्तरा
था जिसे वो
कान के ऊपर
अटका कर रखता
था। अब बंदर
के हाथ में
उस्तरा देख कर
तो हर कोई
डरेगा ही न?
किस्सा उस बंदर
के बचपन से
शुरू होता है।
हुआ यूँ कि
बचपन में उस
बंदर की पूंछ
एक मधुमक्खी के
छत्ते से जा
टकराई और मधुमक्खियों
ने डंक मार
दिया। बस तब
से ही उस
बंदर के मन
में मधुमक्खियों के
प्रति गहरी नफरत
भर गई। जब
भी वो बंदर
कोई छत्ता देखता
तो बदले की
आग भड़क उठती।
पत्थर उठा कर
निशाना मारता और कुंलाचे
मारते हुए नौ
दो ग्यारह हो
जाता।
कहते हैं जॉर्ज
वाशिंगटन को उसके
पिता ने एक
कुल्हाड़ी उपहार में दी
थी। बालक जार्ज
ने मजे ही
मजे में अपने
ही घर का
भरा पूरा बगीचा
काट डाला। ठीक
बिलकुल वैसे ही
बंदर महाराज को
किसी ने उस्तरा
थमा दिया था।
अब उस्तरा मिलते
ही बंदर इस
डाल या उस
डाल पर उछलता
और छत्ता देखते
ही हमला करता
और उस पेड़
को ही काट
देता। सीधी सी
बात है, दुश्मन
का दोस्त दुश्मन।
इसलिए जो पेड़
मधुमक्खियों को अपनी
टहनियों पर प्राश्रय
दे वो भी
तो दुश्मन ही
हुआ न?
बंदर उछलता और अपनी
वानर सेना के
साथ मन मर्ज़ी
से पेड़ों की
टहनियां काटता और किलकारियाँ
भरता। इस पेड़
से उस पेड़
पर कूदता फांदता
और वन में
रहने वाली प्रजा
तालियां बजाती। जो वनवासी
ताली न बजाए
उस पर देशद्रोह
का मुकदमा चला
कर गुफा नामक
जेल में बंद
कर दिया जाता।
प्रजातंत्र था इसलिए
मुक़दमा चलना लाज़मी
था।
एक दिन जैसे
ही राजा बंदर
एक पेड़ की
टहनी पकड़ कर
कूदा वैसे ही
धड़ाम से जमीन
पर गिर कर
धूल चाटने लगा।
जंगल की जनता
हमेशा की तरह
जोर जोर से
तालियां बजाने लगी और
फिर अपना मुंह
घुमा कर खीखी
करके हंसने लगी।
प्रजातंत्र की एक
पहचान ये भी
है कि जनता
का भरपूर मनोरंजन
होता रहता है।
बंदर राजा को
बहुत गुस्सा आया।
“जाओ, पता लगाओ
कि किसने ये
हिमाकत की? पेड़
की डाली कैसे
टूट गई?” बंदर
राजा दांत किटकिटाता
हुआ गुर्राया।
“डाली टूटी तो
टूटी, पर ये
नामुराद जनता जो
हमको भगवान समझती
है उसने पलक
पांवड़े क्यों नहीं बिछाए?”
राजा ने दूसरा
सवाल दागा।
“विदेशी ताकतें? हाथ नहीं
मुँह?”
“जी हुज़ूर वो गोरी
चमड़ी वाले”
“गोरी चमड़ी वाले?”
“वो जो चले
गए और अपनी
औलाद छोड़ गए?”
राजा अपनी क़ाबलियत
पर खुश हुआ।
“नहीं हुज़ूर, वो जो
न खुद गए
और न ही
उनकी औलाद ही
गई।”
“मुझे मालूम था, ये
काम उन्ही नमक
हरामों ने किया
होगा। जिस थाली
में खाते हैं
उसी में छेद
करते हैं!”
“जी हाँ हुज़ूर।
खाते जाते हैं
और छेद करते
जाते हैं ये
गोरे।”
“गोरे? लेकिन ये तो
हमारे तुम्हारे जैसे
ही दिखते हैं
फिर गोरे कैसे
हुए?”
“दीमक, हुज़ूर दीमक। वो
जो काली होती
हैं उनको चींटी
कहते हैं हुज़ूर।”
“दीमक? हमारे राज में
दीमक?” राजा गुस्से
में काँपने लगा।
“हुज़ूर इन दीमकों
ने हमारा हरा
भरा वन खा-खा कर
खोखला कर दिया
है। हज़ारों सालों
से ये दीमक
हमारी वन सभ्यता
को नष्ट कर
रही है।”आला
अफसर को मालूम
होता है कि
सत्ताधीशों को क्या
सुनना पसंद होता
है।
“जनाब ये दोनों,
चींटी और दीमक,
सदियों से मिल
जुल कर रहते
हैं। दरअसल, ये
दोनों सफाई कर्मचारी
हैं। इनके रहते
जंगल हमेशा साफ़
सुथरे रहते हैं।
ये कुदरत की
सफाई व्यवस्था है।
मरे हुए जानवरों
को चींटी सफाई
से चट्ट कर
जाती है। सूखे
हुए पेड़ पत्ते
दीमक साफ़ कर
देती है। ये
न हों तो
जंगल कचरे में
दब कर ख़त्म
हो जाएँ। ” एक
छोटे अधिकारी ने
राजा को समझाने
की कोशिश की।
राजा को ज्ञान
की नहीं, “जी
हुज़ूर” बोलने वाले अधिकारी
की जरुरत होती
है। लगता है
वो अधिकारी अभी
प्रशासन की पूरी
ट्रेनिंग नहीं ले
पाया था इसलिए
उसने अपनी ज्ञान
वार्ता जारी रखी।
“जनाब, हम एक
लोकतंत्र हैं। हमारे
संविधान में गोरे
काले का भेद
वर्जित है।”
बंदर राजा उस नौसीखिए अधिकारी की बात पर मंद मंद मुस्कुराये और फिर एक टीवी रिपोर्टर की ओर रुख करते हुए बोले “इस सेवक पर हमला यानि देश पर हमला। हम एक शांतिप्रिय वन हैं। हम सब धर्मों का आदर करते हैं। चींटियों और दीमक दोनों को मुफ्त में आटा खिलाते हैं” राजा ने शेखी मारी और रिपोर्टर ने आदर सहित स्वीकृति दी।
“जिस पेड़ की
टहनी आपके पराक्रम
और आखेट से
टूट गई थी
वो सूखी हुई
थी और उसे
दीमक ने खोखला
कर दिया था”
एक बड़े अधिकारी
ने राजा के
कान में बात
डाली।
राजा ने तुरंत
मंन्त्री मंडल की
बैठक की और
बोले “हमने तो
इन दीमकों को
पड़ोस के जंगल
में भेज दिया
था और जो
बची थी उनको
अपने उस्तरे की
धार से ध्वस्त
कर दिया था।
ये लगता है
विदेशी दीमक है।
घुसपैठिया दीमक?”
“गोली मार दें?”
एक वानर सेना
के सदस्य ने
पूछा।
“नहीं, अंतर्राष्ट्रीय मामला है।”
“तो हुज़ूर, जैसा आप
फरमाएं। भालू बुलवा
लें?”
देश विदेश से चुपचाप
भालू बुलवाये गए।
भालूओं ने जम
कर दीमक का
नाश्ता किया लेकिन
फिर भी दीमक
थीं कि खत्म
होने का नाम
ही नहीं लेती
थीं। इंटरनेशनल जानवर
राइटस वालों ने
ये मुद्दा खूब
उछाला। लेकिन राजा को
सवाल करने वाले
कभी पसंद नहीं
आते।
“हूँ, तो अब
मुझे ब्रह्मास्त्र यानि
उस्तरा निकालना पड़ेगा” राजा
का गुस्सा बढ़ता
जा रहा था।
राजा मूर्ख होते
हैं, अभिमानी होते
हैं इसे सिद्ध
करने की जरुरत
नहीं है। राजा
ने उस्तरा निकाला
और लगा तांडव
करने। जो सामने
आया वो कट
गया। फूल, पत्तियां,
टहनियाँ, डाल, तना,
जड़ सब काट
डाले।
चमचों से अपने
अपने राजा का
ये हाल नहीं
देखा गया। वानर
सेना के मुखिया
ने भावुक होकर
कहा “हुज़ूर हमारे
होते हुए आपको
उस्तरा उठाना पड़े ये
ठीक नहीं लगता।
अभी अभी आपने
शांतिदूत की प्रतिमा
के साथ सेल्फी
ली थी। आपको
शांति का अंतर-राष्ट्रीय जंगल पुरूस्कार
के लिए नामांकित
भी किया जा
चुका है। राजा
के हाथ कभी
खून से सने
हुए नहीं होने
चाहिये। ये कसाईगिरि
का काम हम
पर छोड़ दो।”
अब कुछ विदेशी
पत्रकार आ धमके
तो खुद को
संयत करते हुए
राजा बोला 'सदियों
से हम सब
साथ साथ मिलजुल
कर भाईचारे से
रहते आए हैं।
चींटी और दीमक
तो हमारे सफाई
कर्मचारी हैं जो
हमारे स्वच्छ जंगल
के अभियान का
आधार स्तम्भ हैं।
हमें शांति बनाये
रखनी चाहिए।'
लेकिन वानर सेना
सब जानती है
कि राजा जो
बोलता है दरअसल
वो उसका उल्टा
ही चाहता है।
वानर सेना डॉग
विसल सुनती है।
आनन् फानन में
चकमक पत्थर घिसा।
सूखी घास ने
आग पकड़ी। चुन
चुन कर दीमक
की झोंपड़ियां जलाई
जाने लगीं।
“मारो, जला डालो।
एक भी दीमक
बच न पाए,
चुन चुन कर
मारो। ये नारा
गूंज उठा।”
कुछ चींटियों ने दीमक
के मुंह पर
कोयले की कालिख
मल कर अपनी
अपनी झोंपड़ियों में
पनाह दी। लेकिन
आग को क्या
मालूम कि कौन
गोरा और कौन
काला। कौन जंगलभक्त
और कौन जंगलद्रोही।
कुछ घंटों में चम्पक
वन जल कर
राख हो गया।
न कोई पेड़
बचा और न
ही कोई पौधा।
न बन्दर राजा
बचा, न वानर
सेना, न अफसर,
न कोई जानवर
और हाँ न
ही दीमक।
सदियों बाद कुछ
पुरातत्व विशेषज्ञों ने वानर
लिपि में लिखा
शिलालेख खोजा। उस पर
खुदा था “ऑपरेशन
सक्सेसफुल, बट पेशंट
डाइड - आला अफसर,
जंगल राज”
