मेरे बारे में

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सोचा चलो ब्लॉग लिखते हैं. एक तो मुफ्त में है और दूसरा ब्लॉग पढ़ कर समझने वालों कि संख्या बहुत कम है. मुझे जानने वाले तो मेरा ब्लॉग पढ़ेंगे नहीं. आखिर कोई कितना झेले? कोई 'सॉरी गलती से मिस्टेक हो गया टाइप' अगर झांसे में आ भी गया तो थोड़ी सी उम्मीद है कि मेरे शब्दों के जाल उसे उलझा कर रख पाएं. कोई नहीं तो मैं और मेरा खुदा तो है ही. जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है. मेरे बड़े भाई नीरज काफी समय से ब्लॉग लेखन में हैं. मैंने उनका ब्लॉग देखा है, पढ़ा नहीं. क्योंकि शायरी का अलफ बे भी मुझे नहीं आता. तो फिर हमने सोच लिया 'अब चाहे सर फूटे या माथा यारा मैंने तो हाँ कर दी, मैंने ब्लॉग की शुरुआत कर दी, मैंने हँस कर हामी भर दी' लिखने को कुछ समसामयिक विषय होंगे. कुछ छोटी मोटी कहानियों या कविताओं की समीक्षाएं होंगी जो मैं मुख्यत: बच्चों की पाठ्य पुस्तकों से चुनूंगा. ये कुछ आसान सी कहानियाँ और कवितायें अब मुझे थोड़ी बहुत समझ आने लगी हैं. ये रचनाएँ आज के सन्दर्भ में सरलता से अति महत्वपूर्ण सन्देश देती हैं. कुछ बातें दिल को छुएंगी तो कुछ बातें गुस्सा भी दिला सकती हैं. बात अपनी अपनी, ख्याल अपना अपना.

शनिवार, 21 मई 2022

3 छुटकियाँ - “और इस तरह”

 छुटकी  #1

 

लहू

 

लहू,

सड़क पर बहा,

फिर बहा, बहता रहा,

बहता रहा, जमता रहा, सूखता रहा,

कोई फल, कोई फूल, कोई पंछी, परिंदे,

और इस तरह एक सभ्यता उजड़ गई... 

 

छुटकी  #2

 

जड़ें

 

जड़ें,

दिखी नहीं, बच गईं,

फूल कुम्हला गए, पत्तियां झर गईं,

सूखे ठूंठ रह गए, कट गए,

लताएं झुलस गईं, कीट मरे, पक्षी उड़ गए,

वृक्ष के साथ जो एक भरा पूरा कुनबा था, अब उजड़ गया,

और इस तरह ये हरी भरी फलती फूलती वसुंधरा निर्जीव और वीरान बन गई...

  

छुटकी  #3


धर्म की परिभाषा

 

उसने कहा ‘मैं बड़ा ,तू छोटा’,

इसने कहातू छोटा, मैं बड़ा’,

फिर जो होता है वो ही हुआ, दोनों भिड़ गए, 

लड़ते रहे निरंतर लड़ते रहे,

और इस तरह धर्म की परिभाषा गढ़ी गई...

आपदा में अवसर

  आपदा में अवसर 'रेवड़ी ले लो, रेवड़ी ले लो' बाहर से जोर जोर से आवाज़ें आ रही थीं। जनप्रिय नेता पीएल ने अपनी पार्टी की टोपी सीधी की औ...