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सोचा चलो ब्लॉग लिखते हैं. एक तो मुफ्त में है और दूसरा ब्लॉग पढ़ कर समझने वालों कि संख्या बहुत कम है. मुझे जानने वाले तो मेरा ब्लॉग पढ़ेंगे नहीं. आखिर कोई कितना झेले? कोई 'सॉरी गलती से मिस्टेक हो गया टाइप' अगर झांसे में आ भी गया तो थोड़ी सी उम्मीद है कि मेरे शब्दों के जाल उसे उलझा कर रख पाएं. कोई नहीं तो मैं और मेरा खुदा तो है ही. जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है. मेरे बड़े भाई नीरज काफी समय से ब्लॉग लेखन में हैं. मैंने उनका ब्लॉग देखा है, पढ़ा नहीं. क्योंकि शायरी का अलफ बे भी मुझे नहीं आता. तो फिर हमने सोच लिया 'अब चाहे सर फूटे या माथा यारा मैंने तो हाँ कर दी, मैंने ब्लॉग की शुरुआत कर दी, मैंने हँस कर हामी भर दी' लिखने को कुछ समसामयिक विषय होंगे. कुछ छोटी मोटी कहानियों या कविताओं की समीक्षाएं होंगी जो मैं मुख्यत: बच्चों की पाठ्य पुस्तकों से चुनूंगा. ये कुछ आसान सी कहानियाँ और कवितायें अब मुझे थोड़ी बहुत समझ आने लगी हैं. ये रचनाएँ आज के सन्दर्भ में सरलता से अति महत्वपूर्ण सन्देश देती हैं. कुछ बातें दिल को छुएंगी तो कुछ बातें गुस्सा भी दिला सकती हैं. बात अपनी अपनी, ख्याल अपना अपना.

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

श्राप

श्राप 












सुबह का सपना था। सच ही होगा। भगवान परशुराम स्वयं मुझे स्वर्ग के द्वार तक छोड़ने आए थे। बोले "वत्स जाओ, वापस जाओ मृत्यु लोक में। धरती का भार कम हो गया है, शेषनाग का संतुलन डगमगा गया है।"

हम ठहरे उच्च कोटि के विप्र। विचरते हुए स्वर्ग लोक में जा पहुँचे। द्वारपाल देखते ही पहचान गया और तुरंत ब्राह्मण कुल के त्रिशुक्ल पंजाब प्रान्त में स्थित बद्दोकी के गुसाईं को दंडवत प्रणाम किया और वीआईपी वाले विशेष द्वार से ब्रह्माजी के दरबार में आदर सहित पहुँचा दिया। 

ब्रह्माजी के दरबार में सभी देवी देवता, ऋषि-मुनि और महान आत्माएँ उपस्थित थीं। एक कोने में देखा तो अपने बापू गाँधी बाबा "पीर पराई जाने रे.." भजन गाने में व्यस्त थे तो दूसरी तरफ कबीर दास जी "कुछ लेना ना देना मगन रहना.." के सुर आलाप रहे थे।  

जैसे ही ब्रह्मा जी के समक्ष उपस्थित हुआ वैसे ही तपाक से उन्होंने गद्गद  होकर गले लगा कर स्वागत किया। फिर थोड़ा सा रुआंसा होते हुए बोले "मेरा वाट्सएप नहीं चल रहा है, यहाँ स्वर्गलोक में नेटवर्क की समस्या हमेशा बनी रहती है। पुत्र बोलो मृत्युलोक के लेटेस्ट समाचार क्या हैं?" फिर प्रश्नवाचक मुद्रा में उन्होने विश्वकर्मा जी की ओर निहारा।  

विश्वकर्माजी के कान खड़े हुए और खिसियाते हुए बोले "प्रभु, नये टावर लगाने का ग्लोबल टेंडर अभी प्रकाशित हुआ है। सिर्फ़ एक जिओ का ही आफर मिला है। लगता है कोई दूसरा प्लेयर मैदान में नहीं है।'

इसके पहले कि मैं कुछ बोलता गाँधी बाबा अपना भजन बीच में ही रोक कर बोले "मेरा नेटवर्क वाईफ़ाई पर नहीं चलता बल्कि जनसम्पर्क पर आधारित है।  अभी जवजीवन प्रेस से ताजा ताजा अख़बार छप कर आया है। इसमें लिखा है कि एक साध्वी ने श्राप दिया है और..."

मैंने बीच मे ही बात काटते हुए उत्सुकता पूर्वक प्रश्न किया "प्रभु, ये साधु - साध्वी आजकल श्राप ही क्यों देते हैं? वरदान क्यों नहीं? तैंतीस करोड़ देवी देवताओं वाले इस भारत वर्ष में कोई भी वरदान क्यों नहीं देता है? कोई एक आध ही कुछ वरदान दे देता तो शायद जीडीपी मे थोड़ा सुधार हो जाता।"

सभा में उपस्थित भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि पुत्र भगवान परशुराम तमतमाते हुए अपना परशु उठा कर मुझे ललकारने लगे "मैंनें अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से इक्कीस बार संहार किया है, मेरे तीर से गुजरात से केरल तक की धरती समुद्र से बाहर आई है। तुम्हारे इस नीच प्रश्न ने मुझे क्रोधित कर दिया है। मैं तुमको श्राप देता हूँ। मैं तुमको तत्क्षण धर्मच्युत करता हूँ..."

मैंने अपनी धृष्टता स्वीकार करते हुए क्षमा माँगी और भगवान को शाँत करने का प्रयास किया। हाथ जोड़ कर वंदना करते हुए निवेदन किया "विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये, सुनहू राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा। अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहू क्षमामंदिर दोउ भ्राता। कह जय जय जय रघुकुल केतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतु।"

फिर चाहे इंसान हो या भगवान अपनी प्रसंशा सुन कर हृदय द्रवित हो जाना स्वाभाविक है। और फिर हृदय परिवर्तित हुआ।  

भगवान परशुराम थोड़ा सहज होते हुए बोले "पुत्र तुम उच्च कोटि के ब्राह्मण कुल के बालक हो और स्वर्ग लोक के अतिथि भी। आज स्वर्ग लोक में स्पेशल दिन है इसलिए एक के साथ एक की स्कीम है। एक के साथ एक कोई भी दो मनचाहे वरदान माँग लो। 

मैं किन्कर्तव्य विमूढ़ हो कर सहायता के लिए इधर उधर झाँकने लगा। तभी कबीर दास जी की मुस्कुराहट से सामना हुआ। कान में धीरे से फुसफुसाए "तुम तो अधर्मी हो गये? अपने लिए मानव धर्म माँग लो। दरअसल मानवता का धर्म के साथ अन्य स्थापित धर्मों के साथ छत्तीस का आँकड़ा है।"

"तथास्तु!"









परशुराम भगवान ने मस्तक से पसीना पोंछा। सोचा, ये मानव धर्म वाला पुराना सड़ा गला गिफ्ट जिसे मैं फेंकने ही वाला था और जो रिटर्न गिफ्ट में भी काम नहीं आता था, आज सही वक़्त पर काम गया।  सस्ते में सौदा हुआ। 

"दूसरा?" भगवान परशुराम ने थोड़ा विचलित होकर पूछा।  

खिचड़ी सीरियल के प्रफुल्ल की मुद्रा में गाँधी बाबा ने अपने सीने पर हाथ रखते हुए टोका "हँसा, सॉरी, दिकरा, बेटा, मैं हूँ ना" और फिर मेरे कान मे धीरे से समझाया। और फिर मुस्कुराते हुए प्रफुल्ल की स्टाइल में ही दोनों हाथ झटकते हुए वापस अपना स्थान ग्रहण किया।

मैने अपना रुंधा गला खंखार कर सॉफ करते हुए कहा "प्रभु, मौलवी जी को पंडित बना दो और पंडित जी को पादरी बना दो और ऐसे ही मृत्यु लोक में सबका धर्म परिवर्तित कर दो।  तब सब लोग "पीर पराई जाने रे की धुन गाएँगे.."

"तथास्तु!"









और धरती अचानक हिचकोले खाने लगी। थोड़ा रुकी।   फिर उल्टी दिशा में चक्कर घिन्नी खाने लगी। 

इन्द्र का सिंहासन वाइब्रेशन मोड पर गया। स्वर्ग की अप्सराओं की जगह जन्नत वाली बसरे वाली हूरें रक्स करने लगीं। आनन फानन में इंद्र देवता ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे लगभग धकेलते हुए बाहर का रास्ता दिखाया। झुंझलाते हुए बोले "वत्स, ये तुमने क्या किया? मुझे मालूम था की ये गाँधी बाबा और वो जुलाहा स्वर्ग मे साजिश रचेंगे। मृत्यु लोक मे धर्म की लड़ाई ख़त्म तो फिर लोग क्या फ़ुर्सत में कबड्डी खेलेंगे और पतंग लूटेंगे? अब तो ये मृत्यु लोक ही स्वर्ग बन जाएगा। फिर मेरी स्वर्ग की रियल एस्टेट की दुकान कैसे चलेगी?"

भगवान परशुराम भी अपना परशु फेंक कर जल्दी से गले लगाते हुए बोले "वत्स, पुष्पक विमान इंतज़ार कर रहा है। जल्दी जाओ मृत्यु लोक में वापस।"

धरती पर धड़ाम से लैंड करते ही एक भगवा वस्त्र धारी महिला के दर्शन हो गये। माथे पर बल थे।  

"ये मुआ मारक मंत्र पढ़ती हूँ तो कलमा मुँह से निकलने लगता है." वो बड़बड़ा रही थी। 

बद हवास भीड़ ने मुझे घूरा। इससे पहले कि मेरी मुस्कान देख कर कोई मेरा मॉब लिन्चिंग करने का इरादा करे, मैं नौ दो ग्यारह हो गया। 

 


 

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