मेरे बारे में

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सोचा चलो ब्लॉग लिखते हैं. एक तो मुफ्त में है और दूसरा ब्लॉग पढ़ कर समझने वालों कि संख्या बहुत कम है. मुझे जानने वाले तो मेरा ब्लॉग पढ़ेंगे नहीं. आखिर कोई कितना झेले? कोई 'सॉरी गलती से मिस्टेक हो गया टाइप' अगर झांसे में आ भी गया तो थोड़ी सी उम्मीद है कि मेरे शब्दों के जाल उसे उलझा कर रख पाएं. कोई नहीं तो मैं और मेरा खुदा तो है ही. जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है. मेरे बड़े भाई नीरज काफी समय से ब्लॉग लेखन में हैं. मैंने उनका ब्लॉग देखा है, पढ़ा नहीं. क्योंकि शायरी का अलफ बे भी मुझे नहीं आता. तो फिर हमने सोच लिया 'अब चाहे सर फूटे या माथा यारा मैंने तो हाँ कर दी, मैंने ब्लॉग की शुरुआत कर दी, मैंने हँस कर हामी भर दी' लिखने को कुछ समसामयिक विषय होंगे. कुछ छोटी मोटी कहानियों या कविताओं की समीक्षाएं होंगी जो मैं मुख्यत: बच्चों की पाठ्य पुस्तकों से चुनूंगा. ये कुछ आसान सी कहानियाँ और कवितायें अब मुझे थोड़ी बहुत समझ आने लगी हैं. ये रचनाएँ आज के सन्दर्भ में सरलता से अति महत्वपूर्ण सन्देश देती हैं. कुछ बातें दिल को छुएंगी तो कुछ बातें गुस्सा भी दिला सकती हैं. बात अपनी अपनी, ख्याल अपना अपना.

शनिवार, 16 सितंबर 2023

कुल्हाड़ी

 कुल्हाड़ी



नीले आकाश तले

वृक्षों के उस झुरमुट में,

दूर कहीं किसी वन में

एक नन्हा सा फूल महकता है।

 

कोयल की बोली सुन कर

एक भंवरा जगता है,

मदहोशी के आलम में पंख फैलाये हुए

उड़ता है, मचलता है।

 

उपवन का हर वासी

रंगो भरे उस आँगन में,

उनींदी आँखे भर कर प्यार लुटाता है,

प्रेम गीत गाता है, चहकता है।

 

मधुबन की इन खुशियों को

शैतानी नज़रों से,

बस दूर ही रहने दो

कुल्हाड़ी लिए हाथों में ये कौन निकलता है?

 


6 टिप्‍पणियां:

  1. Beautifully written.
    Zindagi ka aagaz aur ant dono dikha diye.

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  2. बहुत सुंदर अनुभूति और शानदार अभिव्यक्ति

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  3. बहुत बेहतरीन ! The eeriness impending disquiet is so beautifully expressed! 🙂

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  4. कमाल लिखा है भाई ---वाह वाह--- लिखते रहो लोग आज नहीं तो कल पढ़ेंगे जैसे कबीर को पढ़ते हैं

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