इस मुल्क को आज़ाद हुए 75 साल हो गए. मैं भी अब तक 69 वसंत देख चुका हूँ. फिर भी कुछ लोगों को आज़ादी के नारे लगाते हुए आज भी सुना जा सकता है.
हमें चाहिए आज़ादी…
हाँ करने की आज़ादी…
ना करने की आज़ादी…
हम ले के रहेंगे आज़ादी…
इस से आज़ादी, उस से आज़ादी, सब से आज़ादी. और बोलने की आज़ादी?
ऑफिस में बोलो तो बॉस नाराज़. वाट्सअप ग्रुप में बोलो तो सीधे डिलीट बटन दबा देतें हैं. ट्वीटर में बोलो तो ट्रोल पीछे पड़ जाते हैं. दोस्तों से बोलो तो वो सिर्फ संवेदना में सर हिला देते हैं या फिर शून्य में ताकते रहते हैं.
पुराने समय में ऋषि मुनि अपना घर बार छोड़ कर सीधे हिमालय की पर्वत श्रृंखला का रुख कर लेते थे. पेड़ों से बात करो या गिलहरी को ज्ञान दो, पर कोई जवाब नहीं. हिमालय की घाटियों में जोर जोर से चीख कर अपनी ही प्रतिध्वनि सुनते रहो. ध्यान में समाधि लगा कर प्रभु का स्मरण करो. परन्तु मन में बैठे बंदरों द्वारा प्रश्न पूछे जाने पर कि भाई 'संसार से भागे फिरते हो ..?' और जवाब ना दे पाने पर इधर उधर बगलें झांकों.
थक हार कर हिमालय पर भी कुछ चेले चपाटे तो ढूंढने ही पड़ते हैं. हम बोलें, ज्ञान बघारें तो कोई तो सुने. बिना श्रोताओं की वाह या आह सुने तो कवि के मुंह से कविता भी नहीं फूटती है और फूटती भी है तो ये लाइनें 'रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ..'
घर पर बोलो तो? फिर वही सवाल? ये कैसा सवाल है? घर भी बोला जाता है? फिर आंखे नींची कर के कहते हैं
'तुम वो ही बात क्यों पूछते हो जो बताने के काबिल नहीं है?' सुना है फैज़ ने अपने ही घर में अपनी ही बीबी की आंख में आंख डाल कर 'बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल जो कुछ कहना है कह ले' कहने की हिमाकत की थी. तौबा तौबा, नासमझी की भी हद होती है. खुदा उनको जन्नत नसीब करें.
सोचा सबसे आसान तरीका है कि खुद से ही सवाल पूछ कर खुद ही जवाब दे दूँ. मुझको मन ही मन बड़बड़ाता हुआ देख कर पड़ोसियों ने कानाफूसी शुरू कर दी 'लो अब ये काका भी सठिया गया है.' वैसे भी शायद खुद से भी संवाद करना बहुत मुश्किल काम है.
फिर सोचा चलो ब्लॉग लिखते हैं. एक तो मुफ्त में है और दूसरा ब्लॉग पढ़ कर समझने वालों कि संख्या बहुत कम है. मुझे जानने वाले तो मेरा ब्लॉग पढ़ेंगे नहीं. आखिर कोई कितना झेले? कोई 'सॉरी गलती से मिस्टेक हो गया टाइप' अगर झांसे में आ भी गया तो थोड़ी सी उम्मीद है कि मेरे शब्दों के जाल उसे उलझा कर रख पाएं. कोई नहीं तो मैं और मेरा खुदा तो है ही. जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है.
ब्लॉग भी एक प्रकार का संप्रदाय है. गीता का पाठ या फेसबुक छोड़ कर मेरे ब्लॉग को पढ़ने वाली प्रजाति भक्तों की श्रेणी में ही आएगी. कहते हैं ज्ञान मार्ग से भी बेहतर है भक्ति मार्ग. जो एक बार इस ब्लॉग मार्ग में फंस जायेगा उसकी हालत उस पूंछ कटे बन्दर जैसी ही होगी जो संकोचवश या शर्म के मारे इसी ब्लॉग मार्ग को अपनाने का औचित्य समझाते रहेंगे. और इस तरह से अपनी दुकान चल निकलेगी. वैसे ही जैसे उस सूरमा भोपाली की दुकान, जिसमें दास्तानगोही के प्रेमी फुर्सत में जुट जातें हैं. फिर वही डायलॉग सुनाई देगा 'अरे मियां आप लोगों को कोई और काम हे के नईं, दिन भर बेठे रेते हो और पचीस झूठ हमसे बुलवाते हो, चलो खां काम करो, अरे जाओ भैया जबरन झूमते रेते हो.'
मेरे बड़े भाई नीरज काफी समय से ब्लॉग लेखन में हैं. मैंने उनका ब्लॉग देखा है, पढ़ा नहीं. क्योंकि शायरी का अलफ बे भी मुझे नहीं आता. मेरी छोटी बहन लता हया एक मशहूर शायरा हैं, उनका भी एक ब्लॉग है. लेकिन चूँकि हया मंच पर 'बोलती' हैं इसलिए ब्लॉग लिखने में दिलचस्पी कम दिखाती हैं. मेरा ब्लॉग लेखन से बस इतना ही परिचय है.
कुछ मित्रों ने सलाह दी 'भाई हमको ही मत समझाओ और बहुत जनता है, ब्लॉग लिखो', 'भाई फेसबुक को बख्श दो, व्हाट्स ऍप को जीने दो, ब्लॉग लिखो' या 'तुम बोलते हुए नहीं लिखते हुए बहुत अच्छे दिखते हो, ब्लॉग लिखो.'
तो फिर हमने सोच लिया 'अब चाहे सर फूटे या माथा यारा मैंने तो हाँ कर दी, मैंने ब्लॉग की शुरुआत कर दी, मैंने हँस कर हामी भर दी'
लिखने को कुछ सम-सामयिक विषय होंगे. कुछ छोटी मोटी कहानियों या कविताओं की समीक्षाएं होंगी जो मैं मुख्यत: बच्चों की पाठ्य पुस्तकों से चुनूंगा. ये कुछ आसान सी कहानियाँ और कवितायें अब मुझे थोड़ी बहुत समझ आने लगी हैं. ये रचनाएँ आज के सन्दर्भ में सरलता से अति महत्वपूर्ण सन्देश देती हैं.
कुछ बातें इतिहास की भी होंगी. इतिहास इसलिए क्योंकि जब मेरी माताश्री अपने इतिहास में एम ऐ की परीक्षा की तैयारी करती थीं तब मैं उनको रटने में सहायता करता था. जिस प्रकार अभिमन्यु ने महाभारत काल में अपनी माता की कोख में चक्रव्यूह की अधूरी जानकारी प्राप्त की थी ठीक उसी प्रकार मुझे भी इतिहास का कुछ अल्प ज्ञान मिला. आज भी प्रतिदिन वही इतिहास दोहराया जा रहा है. सही इतिहास को तोड़ मरोड़ कर सत्य से परे रख कर कुतर्क के साथ समाज में पेश किया जा रहा है. इतिहास की सही, सरल और साक्ष्यपूर्ण विवेचना और विश्लेषण आज शायद बहुत आवश्यक है.
धर्म और राजनीति में मैं एक बेहद पिछड़ा हुआ छात्र हूँ इसलिए कुछ सीधे और कुछ टेढ़े प्रश्न खड़े करता रहूँगा. धर्म और राजनीति के समागम से जो काढ़ा उपलब्ध होता है उसका असर समाज को तोड़ने में बहुत गंभीर भूमिका निभा रहा है. इसको अलग थलग किया जाना नितांत आवश्यक है.
आज के परिपेक्ष्य में ये सभी समीक्षाएं या लेख अपनी सार्थकता सिद्ध करने का प्रयास करेंगे, ऐसी मेरी आशा है. कुछ बातें दिल को छुएंगी तो कुछ बातें गुस्सा भी दिला सकती हैं. बात अपनी अपनी, ख्याल अपना अपना.
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Mast likha hai...Likhte raho...waah
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