मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
सोचा चलो ब्लॉग लिखते हैं. एक तो मुफ्त में है और दूसरा ब्लॉग पढ़ कर समझने वालों कि संख्या बहुत कम है. मुझे जानने वाले तो मेरा ब्लॉग पढ़ेंगे नहीं. आखिर कोई कितना झेले? कोई 'सॉरी गलती से मिस्टेक हो गया टाइप' अगर झांसे में आ भी गया तो थोड़ी सी उम्मीद है कि मेरे शब्दों के जाल उसे उलझा कर रख पाएं. कोई नहीं तो मैं और मेरा खुदा तो है ही. जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है. मेरे बड़े भाई नीरज काफी समय से ब्लॉग लेखन में हैं. मैंने उनका ब्लॉग देखा है, पढ़ा नहीं. क्योंकि शायरी का अलफ बे भी मुझे नहीं आता. तो फिर हमने सोच लिया 'अब चाहे सर फूटे या माथा यारा मैंने तो हाँ कर दी, मैंने ब्लॉग की शुरुआत कर दी, मैंने हँस कर हामी भर दी' लिखने को कुछ समसामयिक विषय होंगे. कुछ छोटी मोटी कहानियों या कविताओं की समीक्षाएं होंगी जो मैं मुख्यत: बच्चों की पाठ्य पुस्तकों से चुनूंगा. ये कुछ आसान सी कहानियाँ और कवितायें अब मुझे थोड़ी बहुत समझ आने लगी हैं. ये रचनाएँ आज के सन्दर्भ में सरलता से अति महत्वपूर्ण सन्देश देती हैं. कुछ बातें दिल को छुएंगी तो कुछ बातें गुस्सा भी दिला सकती हैं. बात अपनी अपनी, ख्याल अपना अपना.

रविवार, 30 दिसंबर 2018

हर-हर स्टैचू , घर-घर स्टैचू

हर-हर स्टैचू, घर-घर स्टैचू













मेरा स्टैचू कब बनेगा ? मचल गया दीना का लाल। दीना सोच में पड़ गया।  दीना के बाप दादा का भी कभी स्टैचू नहीं बना तो फिर दीना के लाल की क्या बिसात ?

हुआ यूँ कि दीना का लाल गया था एक मेले में। बच्चे अगर मेले में जायेंगे तो ख़िलौने भी खरीदेंगे। मेहमूद ने सिपाही ख़रीदा तो नूरा ने वकील। सम्मी को धोबिन मिली तो मोहसिन को भिश्ती मन भा गया। मिट्टी के खिलौने सब बच्चों को खूब मन भाये।

हामिद ने जब अपनी दादी के लिए चिमटा ख़रीदा तो दीना के लाल ने ताना मारा 'चिमटा भी कोई चीज़ होती है मेले में खरीदने की ?' और फिर उसने हामिद को चिढ़ाते हुए अपने झोले में से एक खूबसूरत स्टैचू निकाला। बच्चों ने कभी स्टैचू देखा नहीं था। सब ललचाई नज़रों से स्टैचू को निहारने लगे।

दीना फिर बोला 'तुम्हारा चिमटा तीन पैसे का, मेरा स्टैचू तीन रुपये का'

हामिद का चेहरा तमतमा उठा, बोला 'तो फिर कर लो मुकाबला'

चिमटे का एक वार और स्टैचू चकनाचूर। तब से दीना का लाल 'स्टैचू स्टैचू' की रट लगा कर बिलख रहा है। बालक के आँसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं लेते थे।  दीना पुत्र मोह में व्याकुल हो गया।  उधर मेला भी उठ गया था तो अब कहाँ से लाएँ स्टैचू ?

कुछ सूझा तो दीना पहुंचा गाँव के कुम्हार के घर। थोड़ी चिकनी मिट्टी मांगी। लोई बनाई, चाक पर रखी, घुमाया और एक छोटा सा पुतला बना ही लिया। बटन लगा कर दो आँखें भी बना दीं। एक छोटी मटकी ली और बांस के डंडे पर सजाया, नीचे पट्टी पर उकेर दिया 'दीना का लाल, गांव वगैरह वगैरह

दीना का लाल अपने नाम का स्टैचू पा कर फूला नहीं समाया। आखिर दुनियाँ में कुछ गिने चुने ही महापुरुष हैं जिनका स्टैचू बनता है। फिर गाँव का तो ये पहला ही स्टैचू था। वॉट्स-ऐप के ज़माने में स्टैचू बनने की खबर जँगल की आग से भी ज्यादा तेज़ी से फैल गई।

'दीना के बबुवा का स्टैचू बन गया है रे' और समूचा गाँव उमड़ पड़ा स्टैचू देखने। पास पड़ौस के गाँव के गाँव भी धमकने लगे इस अजूबे को देखने के लिए।

सरपंच श्री ने दीना को बुलवा भेजा। त्यौरी चढ़ा कर बोले 'क्यों रे, आज कल बहुत हवा में उड़ने लगा है ?'

'नहीं तो हुज़ूर, हम तो आपके चाकर हैं' खीसें निपोरते हुए दीना मिमियाया।

'फिर वो बबुआ का स्टैचू काहे ?'

'अब का कहें, बाल हठ के सामने हम तो पस्त हो गए' सर झुका कर दीना हौले से बोला।

'लेकिन हमारी तो मट्टी पलीद हो गई। बहुत बुरा हुआ'

' हुज़ूर हम तो ठहरे गरीब गुरबे। अपनी हैसियत के मुताबिक एक छोटा सा स्टैचू बनाये हैं। हम से भूल हो गई हुज़ूर। हम अभी बबुआ का स्टैचू तहस नहस कर देते हैं।'

दीना ने अति कातर भाव से सरपंच श्री को निहारा। फिर थोड़ी हिम्मत जुटा कर बोला 'हुज़ूर छोटा मुँह और बड़ी बात, हम सब गाँव वाले मिल कर आपका एक बड़ा सा स्टैचू चौराहे पर लगवा देते हैं। थोड़ा पैसा पाई की जुगाड़ आप करवा देना। रहम कर के वो पंचायत वाली ज़मीन हमको दिलवा देना। उस ज़मीन पर हम कुछ खाने पीने की दुकान और कुछ झूले वूले लगवा लेंगे। इस गरीब का चूल्हा जल जायेगा और हुज़ूर की वाह वाही भी।'

सरपंच श्री खटिया पर औंधे लेटे मालिश करवा रहे थे। अचानक पलटे और मुस्कुराये। दीना का सुझाव झन्न से उनके मस्तिष्क का द्वार बिना खटखटाए ठीक निशाने पर जा लगा। यानि सरपंच श्री का माथा ठनका। गाँव के चौराहे पर सरपंच श्री का आशीर्वाद देने की मुद्रा में विशाल स्टैचू ? देश में पहली बार गाँव के विकास का मॉडल पूरी दुनिया देखेगी।

आनन् फानन में 'प्रधानमंत्री ग्रामीण स्टैचू विकास परियोजना' के फंड से सरपंच श्री का एक ऊँचा सा स्टैचू बन गया।  इतना ऊँचा कि कोई कौवा भी पर मार सके। और अगर कौवा लाख कोशिश करे तो फिर भी स्टैचू की नाक पर कभी बीट गिरा सके।

इलेक्शन का समय था। वैसे देश में हमेशा इलेक्शन का समय ही रहता है। 'आदर्श ग्राम स्टैचू योजना' के तहत सभी वर्गों के कल्याण के लिए स्टैचू लोन वितरित किया गया। बैंकों ने अपनी तिजोरी के ताले खोल दिए।

कहीं से एक नारा आया 'हर-हर स्टैचू, घर-घर स्टैचू'

झोंपड़ी पर चाहे छत हो या हो, बिजली हो या हो, पानी हो या हो, खाने को अनाज हो या हो पर स्टैचू अवश्य नज़र आने लगे। देश के समग्र विकास की पहली सीढ़ी। दीना का भी स्टैचू बना और दीना के लाल का भी। हर घर के सामने भी स्टैचू बना और पीछे भी। दाएं भी और बाएं भी। देश में अचानक एक हर्षोउल्लास की लहर दौड़ गई।

एक स्टैचू मंत्रालय गठित किया गया। स्टैचू रोज़गार योजना के तहत युवाओं को स्टैचू बनाने की तालीम दी गई। पर्यटन विभाग ने देशाटन के लिए स्पेशल बुलेट ट्रेन भी चलाई जो गाँव-गाँव, शहर-शहर, रंग-बिरंगे, छोटे-बड़े स्टैचू  के दर्शन कराए। विदेशी पर्यटक ताज़ महल छोड़ कर विभिन्न स्टैचू देखने के लिए घंटों लाइन में खड़े रह कर इंतज़ार करते देखे गए। देश विदेश में स्टेचुओं की धूम मच गई।

'भला उसका स्टैचू मेरे स्टैचू से बड़ा कैसे ?'

गाँव-गाँव और शहर-शहर स्टैचू बनाने की होड़ लग गई। बड़े से बड़े स्टैचू बनने लगे। हर गाँव, हर शहर में अब स्टैचू का कद बढ़ने लगा। प्रतिस्पर्धा बढ़ी। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के अंतर्गत विदेशों से विशेषज्ञ बुलाए गए। खुली विश्व व्यापार नीति के कारण पूरा मार्किट सस्ते सुन्दर और टिकाऊ स्टेचुओं से पट गया। विश्व भर में और खास तौर पर यूएनओ ने इस प्रयास को बहुत सराहा। विदेशी मुद्रा के भंडार भरने लगे। देश में लाखों करोड़ों स्टैचू के उत्पादन से जीडीपी में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। डिक्शनरी को एक नया शब्द मिला 'स्टेचुनोमिक्स'...

विश्व की प्रथम विस्तृत स्टैचू परियोजना के अंतर्गत 'धरती से स्वर्ग तक ऊँचा स्टैचू' बनाने के लिए वर्ल्ड बैंक से लोन की मंज़ूरी मिल गई। इसमें लगी विशेष लिफ्ट स्वर्ग के पहले द्वार तक नॉन-स्टॉप ले जाएगी, ऐसी अद्भुत परिकल्पना की गई है। सन २०२२ तक स्वर्ग के सातों द्वार तक इस लिफ्ट की सीधी सेवाएं उपलब्ध हो सकेंगी।

इलेक्शन की तारीख की घोषणा की जाने वाली थी। जनता की आवाज़ पर सभी जन-जन के स्टैचू लोन माफ़ कर दिए गए। जिसका जितना ऊँचा स्टैचू उसका उतना बड़ा दबदबा और उतनी ही प्रबल इलेक्शन जीतने की सम्भावना जग जाहिर थी।

सट्टा बाजार गरम था।

पता नहीं कहाँ से इलेक्शन की ठीक तारीख के दिन आकाशवाणी हुई। अचानक हर तरफ से 'हामिद के चिमटे' की प्रतिध्वनि सुनाई देने लगी। बेमौसम बरसात के बादल घुमड़ने लगे। और अचानक पाँसा पलट गया।

इस लेखन में कुछ कल्पित पात्र मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' और सियाराम शरण गुप्त की कविता 'मैं तो वही खिलौना लूँगा' से प्रभावित हैं। ये दोनों रचनाएँ स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में आसानी से उपलब्ध हैं। आपने नहीं पढ़ी हैं तो समय मिलने पर अवश्य पढ़ें। 


http://premchand.kahaani.org/2006/03/blog-post_114186257841658058.html

14 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut hi badhiya..स्टेचुनोमिक्स' ,,,,☺️

    जवाब देंहटाएं
  2. " शरद जोशी " बनने की ओर बढ़ते कदम। वाह वाह क्या बात है !!! बहुत खूब लिखा है आपने ।

    जवाब देंहटाएं

आपदा में अवसर

  आपदा में अवसर 'रेवड़ी ले लो, रेवड़ी ले लो' बाहर से जोर जोर से आवाज़ें आ रही थीं। जनप्रिय नेता पीएल ने अपनी पार्टी की टोपी सीधी की औ...