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सोचा चलो ब्लॉग लिखते हैं. एक तो मुफ्त में है और दूसरा ब्लॉग पढ़ कर समझने वालों कि संख्या बहुत कम है. मुझे जानने वाले तो मेरा ब्लॉग पढ़ेंगे नहीं. आखिर कोई कितना झेले? कोई 'सॉरी गलती से मिस्टेक हो गया टाइप' अगर झांसे में आ भी गया तो थोड़ी सी उम्मीद है कि मेरे शब्दों के जाल उसे उलझा कर रख पाएं. कोई नहीं तो मैं और मेरा खुदा तो है ही. जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है. मेरे बड़े भाई नीरज काफी समय से ब्लॉग लेखन में हैं. मैंने उनका ब्लॉग देखा है, पढ़ा नहीं. क्योंकि शायरी का अलफ बे भी मुझे नहीं आता. तो फिर हमने सोच लिया 'अब चाहे सर फूटे या माथा यारा मैंने तो हाँ कर दी, मैंने ब्लॉग की शुरुआत कर दी, मैंने हँस कर हामी भर दी' लिखने को कुछ समसामयिक विषय होंगे. कुछ छोटी मोटी कहानियों या कविताओं की समीक्षाएं होंगी जो मैं मुख्यत: बच्चों की पाठ्य पुस्तकों से चुनूंगा. ये कुछ आसान सी कहानियाँ और कवितायें अब मुझे थोड़ी बहुत समझ आने लगी हैं. ये रचनाएँ आज के सन्दर्भ में सरलता से अति महत्वपूर्ण सन्देश देती हैं. कुछ बातें दिल को छुएंगी तो कुछ बातें गुस्सा भी दिला सकती हैं. बात अपनी अपनी, ख्याल अपना अपना.

रविवार, 11 नवंबर 2018

माल - ए – मुफ्त, दिल - ए - बेरहम

माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम









माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम ?

"कन्नौज का बेहतरीन इत्र मुफ्त में ले जाओ मियाँ" लाला मुस्कुराते हुए बोले. 

"और हाँ फ़िरोज़ाबाद की झनझनाती चूड़ियां भी भाभी के लिए एकदम मुफ्त.."


"मुफ्त में?.." कल्लन सकपकाया.

"हाँ भाई हाँ, बिलकुल मुफ्त. इत्र के साथ चूड़ियां भी मुफ्त" लाला ने निष्कपट भाव से जवाब दिया.

"लेकिन मुफ्त?.. कल्लन ने लगभग हकलाते हुए पूछा.

"क्यों? मुफ्त में क्यों नहीं?" लाला अपनी मूछों पर बल देते हुए इतरा कर बोले.

कल्लन ने कनखियों से इधर उधर झाँका. कोई हंस तो नहीं रहा. बाजू की दुकान पर प्रोफेसर लाल खस्ता कचौरी चटकारे मार कर खाने में व्यस्त थे.

लाला बोले "देखो भाई जापान ने मुफ्त में, यूँ ही मुफ्त में, अट्ठासी हजार करोड़ रूपये दे दिए. करोड़ कितना होता है जानते हो ना?"

अब कल्लन के सर खुजाने का समय था. बचपन से ही जापानी खिलौनों का नाम सुनता आया था कल्लन. जापानी गुड़िया तो पूरी दुनियाँ में मशहूर थीं. अफ़सोस इस बात का था की कभी देखने को भी नसीब नहीं हुई. शायद बहुत महंगी रही होगी. जब सारा दिन गिल्ली डंडे, सितोलिये, छुपन-छुपाई और गिट्टे खेलने में बीत जाए तो जापानी गुड़िया की कमी भला किसको खलेगी? जापानी गुड़िया की कमी महसूस ना होने का एक दूसरा कारण भी था. राशन की लम्बी लाइन. पीएल ४८० का एक पंसेरी लाल गेहूं, दो लीटर घासलेट का तेल और नसीब अच्छा हो तो आधा सेर काली पीली बारीक़ चीनी. जब राशन वाला दुकान ना खोले या बाहर 'स्टॉक नहीं है' का बोर्ड लगा दे और फिर अगले दिन दोबारा उसी लाइन में खड़ा होने पड़े तो किसी 'कंचे जैसी फिरोज़ी आँखों वाली जापानी गुड़िया' का सपने में भी ख्याल आना नामुमकिन था. 









"बुलेट ट्रेन यानि गोली जैसी तेज़ चलने वाली ट्रेन" लाला ने जानबूझ कर रेलगाड़ी नहीं बोला था. रेलगाड़ी बोलने से लगता कि किसी बैलगाड़ी जैसी चीज़ की बात कर रहे हों.

"जापान ने इतनी महंगी बुलेट ट्रेन ही क्यों दी? पहले तो कभी एक गुड़िया भी मुफ्त में नहीं दी थी" कल्लन की छोटी सोच ने उसको बोलने पर मजबूर कर दिया.

"हाँ सो तो है, लेकिन..." लाला सोच में पड़ गया.

"गरीब भूख के मारे हाथ फैलाये तो भिखारी कहलाता है. एक पैसा दो पैसे मांगे तो दुत्कार दिया जाता है. फिर भला हमको ऐसे ही मुफ्त में बुलेट ट्रेन लेने में संकोच नहीं हुआ? कल्लन ने अपनी विद्वता झाड़ी.

लाला को कुछ सूझा नहीं पर बोले "देखो भाई, हमने माँगा नहीं, उन्होंने खुद ही दे दिया"

"लेकिन जिसने आज तक एक खोटी चवन्नी भी नहीं दी वो अचानक अट्ठासी हज़ार करोड़ कैसे देगा?" कल्लन ने शक जाहिर किया.

"इतने तीर्थ स्थान हैं, मंदिर हैं, बड़े बड़े पैसे वाले सोना चाँदी और करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाते हैं. लाला ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया.

"लेकिन हमको कोई दान चढ़ावा क्यों देगा? कल्लन सोच में पड़ गया.

"अरे भाई कल्लन मियाँ, भारत विश्व गुरु है ना इसलिए" अचानक ये जवाब देकर लाला की बांछें खिल गईं.

"मेरी दादी कहती थी कि देने वाले का हाथ हमेशा ऊपर होता है इसलिए वो बड़ा होता है. और गुरु दक्षिणा तो ज्ञान देने के बाद ही मिलती है ना? कल्लन ने फिर सवाल दागा.

प्रोफेसर लाल ने कचौरी खाकर चटनी वाले हाथ पोंछते हुए बीच बचाव किया. "भारत विश्व गुरु था और रहेगा. जापान ने अट्ठासी हज़ार का सॉफ्ट लोन दिया है जो धीरे धीरे तीन लाख करोड़ बन जायेगा, मुफ्त में वाला तो एक वाटसएप यूनिवर्सिटी वाला जुमला है भाई"

प्रोफेसर लाल गांव के प्राइमरी स्कूल में सारे विषय पढ़ाते थे. अजीब सा गोल फ्रेम वाला चश्मा लगाते थे इसलिए सब उनको प्रोफेसर बुलाते थे. स्कूल के मास्टर थे सो उनको हर विषय का गूढ़ ज्ञान होना लाज़मी था. केबीसी में 'घर बैठे जैकपोट' जीतने के हर सवाल का सही जवाब भी देते थे. वो अलग बात है कि कभी नेटवर्क तो कभी बिजली फेल हो जाने के चलते ईनाम पाने से महरूम रह जाते थे. बैटर लक नेक्स्ट टाइम.

कल्लन को अपनी अज्ञानता पर बहुत शर्म आयी और उसने अपना सर झुका लिया. प्रोफेसर लाल को श्रोता मिले तो चहकते हुए अपना ज्ञान बघारने लगे "भारत का सबसे बड़ा योगदान है - शून्य"

"शून्य" कल्लन और लाला दोनों के मुंह खुले के खुले रह गए.  

"हाँ शून्य" प्रोफेसर साहेब ने कचौरी खा कर तृप्ति से डकार लेते हुए जवाब दिया. दोनों को लाजवाब देख कर प्रोफेसर साहब दोनों हाथ हिला कर अमिताभ बच्चन के अंदाज़ में बोले "भला बताओ तो अट्ठासी हज़ार करोड़ में कितने शून्य होते हैं?"

"इतना ही पढ़े लिखे होते तो यूँ घास थोड़े ही छील रहे होते? लाला खिसिया कर बोले. 

अब प्रोफेसर ने दार्शनिक जैसे अंदाज़ में अपनी हिटलर जैसी मूछों पर हाथ फेरते हुए जवाब दिया "अट्ठासी हज़ार करोड़ में उतने ही शून्य होते हैं जितने शून्य टूजी घोटाले में होते हैं. खैर ये सब बातें तुम लोगों को समझ नहीं आएंगी"

यह सुन कर लाला आहत होते हुए बोले "सो तो है. हर घोटाले में बहुत सारे शून्य होते हैं"

"और जज साहब सुबूत का इंतज़ार करते रहते हैं" कल्लन ने चुटकी लेते हुए 'जॉली एलएलबी' के डायलॉग की नक़ल करते हुए माहौल को हल्का करने कि कोशिश की. 

लेकिन प्रोफेसर लाल की गंभीर मुद्रा पर कोई असर नहीं हुआ और वो बोलते गए "जिस धरती पर अतीत काल से शून्य से लेकर पुष्पक विमान तक बनते हों उसे अब जापान से एक रेल गाड़ी खरीदनी पड़ती है. अट्ठासी हज़ार करोड़ में लाखों गॉवों में कितने ही प्राइमरी स्कूल और कॉलेज बन जाते"

प्रोफेसर लाल का बोलते बोलते गला रुंध गया. लाला ने इत्र और चूड़ियां एक पोटली में बांध दी और बोले "दोस्ती हमेशा मुफ्त में ही होती है कल्लन मियाँ. प्यार के कोई दाम नहीं होते"

दिन ढलने को था. शाम का धुंधलका छाने लगा. शायद धूल भरी आँधी आएगी. गांव की सर्पीली कच्ची पगडण्डी पर रामलाल की बैलगाड़ी हिचकोले खाती आ रही थी. कल्लन लपक कर उसमें सवार हो गया. अपनी पोटली में रखी इत्र और चूड़ियां प्यार से सहेज लीं. कोई तो है जो कहता है वो करता है. लाला की प्यार भरी सौगात पा कर उसकी ऑंखें भर आईं थीं. 



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